आख़िर पंचायतों को सशक्त क्यों होना चाहिए?

ग्राम पंचायत की आत्मा तथा स्थानीय स्वशासन का सदन ग्राम सभा है। यही नहीं ग्रामसभा लोकताँत्रिक विकेंद्रीकरण का प्रथम सोपान है।  गाँधी जी का सपना था कि भारत में एक ऐसी व्यवस्था हो जहाँ लोगों द्वारा सरकार चलाई जाए और उन्होंने देश के विकास में ग्रामीण जनों की सहभागिता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा था कि, “सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठ कर 20 आदमी नहीं चला सकते हैं, वह गाँव के लोगो द्वारा चलाई जानी चाहिए”।

73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसके तहत पंचायतों को शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, जलप्रबंधन और गरीबी जैसे 29 विषय सौंपे गए।

अगर हम राजस्थान और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों की बात करें तो वहाँ की पंचायतों को बहुत सारी शक्तियाँ दी गई हैं, जैसे कुछ कर वसूलने की शक्तियां, परंतु अगर बिहार की बात करें तो यहाँ पंचायतो को कर वसूलने की शक्ति प्रदान नहीं की गई हैं जिससे पंचायतें अपनी ज़रूरतें पूरी कर पाएं। पंचायती राज विकेंद्रीकरण सूचकांक के आकड़ों के आधार पर भी इसे देखा जा सकता है। बिहार में केवल 0.7 % ग्राम पंचायतों के पास कर वसूलने की शक्ति है जो सबसे कम है। बिहार के तुलना में उड़ीसा में यह आकड़ा 54.5% है तथा यदि आरक्षण की बात करें तो बिहार ऐसा प्रथम राज्य है जहां महिलाओं को 50% आरक्षण देने का काम किया गया था।

ग्राम पंचायतों के कार्य ( धारा-22) में कहा गया है कि पंचायतों के ज़िम्मे 31 कार्य हैं, जिसमें से सामान्य कार्य के रूप में पंचायत अपने क्षेत्र के लिए पंचायत विकास कार्य योजना बनाएगी और इसके साथ वार्षिक बजट भी अनिवार्य कर दिया गया है। बिहार के अलावा अन्य राज्यों की स्थिति से भी पता चलता है कि अभी भी पंचायतों में अधिकतर कार्य केंद्र एवं राज्य प्रायोजित होते हैं। पंचायतें अपनी ज़रूरतों के अनुसार कार्य नहीं कर पाती हैं और इसका खामियाज़ा वहां पर रह रहे लोगों को उठाना पड़ता है। उदहारण के लिए राजस्थान और केरल ऐसे राज्य हैं, जिन्हें कर लगाने एवं वसूलने से लेकर खर्च करने की स्वंत्रता है।

पंचायत के सशक्त होने से क्या हो सकता है ?
गाँव के विकास की योजनाओं को लागू करने में गाँव के लोगों की सक्रीय भागीदारी होगी। योजनाओं का आकलन गाँव के लोगों के द्वारा ही किया जायेगा और योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी भी तरह की परेशानियों का हल गाँव के लोग खुद ही ढूंढेंगे। केंद्र और राज्यों के द्वारा दी गई धनराशि का सही इस्तेमाल किया जा सकेगा। कार्यों के प्रति पंचायतों की जबाबदेही और पारदर्शिता बढ़ जायेगी। इससे पंचायती व्यवस्था जितनी मज़बूत होगी, उतना ही लोकतंत्र मज़बूत होगा और पंचायत में रह रहे आख़िरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुँच पायेगा।

पंचायतें सशक्त कैसे हो सकती हैं?
सशक्त पंचायत बनाने के लिए सब की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही उच्च स्तरीय सरकारों द्वारा  पंचायतों को खुला पैसा दिया जाना चाहिए, जिससे पंचायत अपनी आवश्यकता के अनुसार खर्च कर सके। यानी पंचायत को शक्ति के साथ पैसे खर्च करने की स्वंतत्रता भी मिलनी चाहिए। पंचायतों के लिए योजनाओं की आवंटित एवं खर्च राशि की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जानी चाहिए ताकि प्रत्येक नागरिक उसको जान सके, उससे सम्बंधित सवाल-जवाब कर सके। पंचायतों को वर्ष में होने वाली ग्राम सभाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी को अधिक से अधिक सुनिश्चित करना चाहिए ताकि स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा चर्चा हो पाए। कर वसूल करने तथा खर्च करने की इतनी शक्ति ज़रूर होनी चाहिए, जिससे पंचायतों को भी सही मायने में खुद को सरकार के रूप में आगे लाने का मौका मिले।

अंततः उच्च सरकारों को वास्तव में पंचायती राज संस्थाओं को वे सभी अधिकार देने होंगे जिससे वे न केवल स्थानीय समस्याओं का आकलन सही से कर पायेंगे बल्कि यथासंभव उनका सही से निपटारा भी कर पाएंगे। अब इसके लिए उन्हें किस तरह की क्षमता उत्सर्जन की आवश्यकता होगी, इसका आकलन समय-समय पर करके उसे पूरा किया जा सकता है। यही कुछ मूलभूत प्रयास हैं जिनको आगे बढ़ाने से न केवल लोगों को ज्यादा जल्दी तथा बेहतर सेवाएं मिल पाएंगी बल्कि पंचायतें भी सरकार के रूप में स्थापित करने में खुद को ज्यादा सहज महसूस कर पाएंगी।