शासन-कोष

भारत में सरकार और प्रशासन से सम्बंधित हर दिन नए विवरण सामने आते हैं | इस बात को ध्यान में रखते हुए, इस शासन-कोष (शासन और सक्रिय नागरिक- कोष) में हमारा प्रयास देश भर से सरकार और प्रशासन की नयी जानकारी को आप तक लाना हैं। यहाँ आप देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रशासनिक क्षेत्रों के बारे में पढ़ सकते हैं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, वृत आदि |

हमारी उम्मीद है की इस प्रकार के ज़मीनी स्तर के आदान प्रदान से आप सब की जिज्ञासा और बढ़ेगी।

अगर आप भी किसी वेबसाइट या अखबार में ऐसी कोई जानकारी पढ़ते हैं, और अपने साथियों के साथ बांटना चाहते हैं, तो humaari.sarkaar@accountabilityindia.org पर हमें ईमेल कर सकते हैं |

यहाँ दिए गए लेख, वीडियो आदि अकाउंटबिलिटी  इनिशिएटिव के विचारों को व्यक्त नहीं करते हैं।  

लेखक ने इस लेख में सरकार द्वारा पेश किये गए शिक्षा विधेयक के बारे में अपने विचार रखे हैं | इस लेख में वह बताते हैं कि केंद्र सरकार ने कक्षा 5 और कक्षा 8 के बच्चों के लिए उसी कक्षा में रोके जाने के लिए लोकसभा में विधेयक पेश किया है हालांकि यह शिक्षा के अधिकार क़ानून के विपरीत है| लेखन अलग-अलग तर्कों को सामने रखते हुए कहते हैं कि क्यों इस विधेयक के बारे में सरकार को पुनर्विचार किया जाना चाहिए |

आगे पढ़े >


इस लेख में भारतीय उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति के बारे में बताया गया है | इसमें अन्य देशों के साथ तुलना करके बताया गया है कि कैसे भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था दुसरे देशों से साल दर साल पिछड़ती जा रही है | इस लेख में अलग-अलग स्रोतों से जानकारी इकठ्ठा की गई है | इस लेख में लिए गए आंकड़े बताते हैं कि भारत की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के लिए शिक्षकों की कमी होना, सरकार द्वारा शिक्षकों की कम समय के लिए नियुक्ति करना तथा धन की कमी होना एक बड़ा कारण है |

आगे पढ़े >


इस लेख में रश्मि शर्मा बता रही हैं कि भारत में जो भी नीतियाँ बनायी जाती हैं वह बेहतर तरीके से जमीनी स्तर पर कार्यान्वित क्यों नहीं हो पातीं| इस लेख में रश्मि शर्मा ने प्रशासनिक ढांचे को केन्द्रित किया है | वह बता रही हैं कि यदि सेवाओं को सही तरीके से लागू करना है तो नौकरशाही को कार्य कुशलता एवं जरूरत के आधार पर निर्णय लेने जैसे आवश्यक कदम उठाये जाने की जरूरत है|

आगे पढ़े >


इस ब्लॉग में लेखक ने भारत की पंचायती राज व्यवस्था में विकेद्रिकरण की तस्वीर को पाठकों के समक्ष रखा है | लेखक ने भारत में 73वें संवैधानिक संशोधन के लागू होने के 25 वर्षों के बाद स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकरण का विश्लेषण किया है जिसमें उन्होंने सकारात्मक एवं नाकरात्मक पहलुओं पर प्रकाश डाला है | लेखक के अनुसार इस क़ानून के आने के बाद स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागेदारी, जातिवाद आरक्षण एवं अन्य सामजिक मुद्दों में विकास को गति मिली है | लेकिन बावजूद इसके अभी भी कुछ एक राज्यों को छोड़कर अधिकाँश राज्यों में स्थानीय स्तर पर धन एवं अधिकारों का हस्तांतरण नहीं हुआ है तथा स्थानीय सरकारों को अपनी दी गई जिम्मेदारियों एवं जरूरतों के लिए राज्य एवं केंद्र का ही मुंह ताकना पड़ता है |

आगे पढ़े >


इस ब्लॉग में लेखक सामाजिक योजनाओं की जमीनी हकीकत से पाठकों को रूबरू कराते हैं| इस लेख में वह बताते हैं कि भारत में अभी भी सामाजिक योजनाओं और निति निर्माण के बीच में काफी अन्तर है | नीतियाँ ऐसे लोग बनाते हैं जिनका जमीनी वास्तविकता के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं होता | इस लेख में लेखक ने अलग-अलग राज्यों में जाकर जमीनी स्तर के लाभार्थियों के अनुभवों को जाना है, जिसके आधार पर लेखक का कहना है कि सेवा प्रदाता अभी भी जनता के प्रति वास्तव में जवाबदेही नहीं है| इसलिए पंचायतों को ज्यादा अधिकार एवं शक्तियां देकर सशक्त करना होगा ताकि वे जमीनी जरूरतों का आकलन करके लाभार्थियों तक ज्यादा बेहतर सेवाएं पहुंचा सकें|

आगे पढ़े >


इस सम्पादकीय में नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य निति 2017 का विश्लेषण किया गया है| इसमें बताया गया है कि इस निति के लागू होने के बाद किस तरह के प्रभाव देखने को मिलेंगे मसलन, निजीकरण को बढ़ावा, महंगा इलाज इत्यादि| इस सम्पादकीय में दुसरे देशों की तुलना में भारत द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में किये जाने वाले खर्च के बारे में चर्चा की गई है|

आगे पढ़े >


इस ब्लॉग में डॉ. महेश भारद्वाज भारत में नौकरशाही और राजनितिक दलों के बीच इतिहास से लेकर वर्तमान समय में रिश्तों के बारे में बता रहे हैं | लेखक का कहना है कि विकास को गति देने के लिए इन दोनों को ही संतुलन बनाकर रखने की आवश्यकता है क्योंकि जहाँ पर इनके रिश्तों में सामंजस्य नहीं रहता वहां अवश्य ही विरोधाभास होता है, जिसका प्रभाव सेवाओं पर पड़ता है| लेखक बताते हैं कि नौकरशाहों तथा राजनितिक दलों को जहाँ पर भी संभव हो वहां एक दुसरे को सहयोग देना चाहिए क्योंकि दोनों ही जनता के प्रति जवाबदेही होते हैं|

आगे पढ़े >


इस ब्लॉग में लेखक भारत में जन धन योजना के वास्तविक पहलुओं को सामने लाते हैं | जिसमें वह बता रहे हैं कि क्या वास्तव में इस योजना के आने के बाद लोगों में बैंकिंग सिस्टम के प्रति रुझान बढ़ा है| लेखक कुछ तथ्यात्मक आंकड़ों के साथ बता रहे हैं कि वास्तव में इस योजना के आने के बाद लोगों के जीवन में क्या बदलाव हुआ है तथा बैंकों में इसका क्या प्रभाव पड़ा है|

आगे पढ़े >


इस लेख में लेखक सूचना का अधिकार क़ानून और इसकी बारीकियां पाठकों के समक्ष रख रहे हैं| इसमें लेखक बताते हैं कि भारत के लोगों को सरकारी कार्यालयों, योजनाओं के प्रति जागरूक होना आवश्यक है | यह लेख में बताते हैं कि यदि सूचनाएं सटीक हो, प्रश्नों के सही उत्तर दिए जाएं तथा समय पर सूचना मिले, इससे प्रशासनिक कुशलता बहुत बढ़ सकती है और इस क़ानून की वजह से लोगों को सूचना प्राप्त करने की ताकत मिली है |

आगे पढ़े >


इस ब्लॉग में लेखक ने भारत की नौकरशाही की मौजूदा स्थिति के बारे में अपने अनुभव एवं तर्कों के आधार पर विचार रखें हैं| लेखक का मानना है कि भारत में नौकरशाह सेवा वितरण प्रणाली में अपनी एक अहम् भूमिका निभातें है | जिस तरह से नौकरशाहों की निगरानी के लिए बायोमेट्रिक मशीनों का चलन बढ़ रहा है उससे इनके के मन में भय, संदेह एवं अविश्वास के माहौल का जन्म हो रहा है | इससे नौकरशाह धीरे-धीरे सेवा वितरण प्रणाली में बेहतरी के लिए नये-नये सुझावों एवं अविष्कारों के बजाय स्वयं को तय की जा रही सीमाओं में बाँध रहे हैं |

आगे पढ़े >


Page 2 of 2