क्या हमारे बच्चे स्वस्थ हैं?- बाल दिवस विशेषांक

साथियों, हर वर्ष की तरह हम इस वर्ष भी बाल दिवस मना रहे हैं। जब बच्चों की बात आती है तो ये सोचना भी बेहद आवश्यक हो जाता है कि क्या हमारे बच्चे जो देश का भविष्य हैं, वे पूरी तरह से स्वस्थ हैं भी या नहीं? बल्कि कोरोना ने तो इस चिंता को और भी अधिक बढ़ा दिया है।

शुरूआती वर्ष (0 से 8 वर्ष) बच्चे के विकास के सबसे असाधारण वर्ष होते हैं। जीवन में सब कुछ सीखने, मजबूत बनने की क्षमता इन्ही वर्षों पर निर्भर करती है। इस नींव को ठीक से तैयार करने के कई फायदे हैं, यानी बच्चों को ठीक से पोषण मिले तो वे भविष्य में और भी बेहतर करने योग्य हो पाएंगे। इसलिए यह ज़रूरी है कि उन्हें स्वस्थ एवं पोषणयुक्त जीवन मिले ताकि किसी भी परिस्थिति के लिए वे मानसिक तथा शारीरिक, दोनों तौर से तैयार हो पायें।

ऐसे आदर्श स्थितियों के लिए बच्चे का जन्म से ही स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है लेकिन फिलहाल पोषण की ये स्थितियां भारत में आदर्श दिखाई नहीं दे रहीं!

  • हाल ही में आई वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2021 रिपोर्ट के अनुसार भारत 116 देशों में फिसलकर 101वें स्थान पर आ गया है जबकि साल 2020 में देश 94वें स्थान पर था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी स्थिति कितनी गंभीर है।
  • वहीं राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)- 5 के अनुसार, देश भर के कई राज्यों ने कुपोषण की स्थिति में सुधार के बावजूद एक बार पुनः कुपोषण के मामलों में वृद्धि दर्ज की है। भारत में विश्व के लगभग 30% अल्पविकसित बच्चे और पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 50% गंभीर रूप से कमज़ोर बच्चे हैं।
  • अकाउंटबिलिटी इनिशिएटिव, सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च के बजट ब्रीफ-2021 के आंकड़ों पर नज़र डालें तो देश के कई राज्यों में एक तिहाई बच्चे (0-5 साल के बच्चे) अपने उम्र के हिसाब से लम्बाई में छोटे है। मेघालय, बिहार जैसे राज्यों में ये आंकड़े करीबन आधे एवं मणिपुर, केरल, सिक्किम जैसे राज्यों में एक चौथाई तक है यानी की हमारे बच्चों में विकास नहीं हो पा रहा। वहीं अगर ऊँचाई के हिसाब से बच्चों में वजन की बात करें तो कई राज्यों में 20% से अधिक बच्चों में उनकी ऊँचाई के हिसाब से अनुकूल वजन नहीं था।
  • हालाँकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, एन.एफ.एच.एस-4 (2015-16) और एन.एफ.एच.एस-5 (2019-20), के आंकड़ों के अनुसार भारत की शिशु मृत्यु दर 2016 में 34 से कम होकर 2018 में 32 हुई है, जो कुछ सुधार को दर्शाता है।

हम सब जानते है कि इन स्थितियों में व्यापक सुधार एवं बच्चों के उचित पोषण के लिए  पोषण अभियान, एकीकृत बाल विकास परियोजना (ICDS) जैसी योजनाओं का बड़ा अहम रोल है। भारत सरकार द्वारा इन योजनाओं पर कितना खर्च किया गया, उसकी विस्तृत जानकारी आप इन बजट ब्रीफ में पढ़ सकते हैं। मौटे तौर कहा जाए तो कोरोना महामारी ने इन योजनाओं पर ख़ासा असर डाला है।

  • मार्च 2020 -अप्रैल 2020 में करीबन बच्चों के वजन लेने में उत्तर प्रदेश (-57%), बिहार(-33%), अरुणाचल(-44%), राजस्थान (-28%) जैसे राज्यों में एक तिहाई से अधिक तक की गिरावट आई। वहीं कोरोनाकाल के दौरान ज़मीनी स्तर पर समेकित बाल विकास योजना को चलाने वाले अधिकारी जैसे बाल विकास अधिकारी एवं महिला पर्यवेक्षक के स्वीकृत पदों पर राजस्थान, बिहार उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लगभग आधे पद खाली थे।

इसलिए ये कहना गलत न होगा कि योजनायें चाहे कितनी ही बेहतर क्यों न हो, जब तक उनको चलाने वाले अधिकारी ही नहीं होंगे तो उनमें सकारात्मक प्रभाव कैसे दिखेगा!

वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2020 के अनुसार, भारत विश्व के उन 88 देशों में शामिल है, जो संभवतः वर्ष 2025 तक ‘वैश्विक पोषण लक्ष्यों’ को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकेंगे।

इन आंकड़ो को देखकर कुल जमा बात यह है की चाहे हम इन विशेष दिवसों से ही चर्चा शुरू करें लेकिन बच्चों के पोषण को लेकर योजनाओं के ज़मीनी स्तर के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने की ठोस रणनीति बनानी होगी।