‘स्वच्छ भारत मिशन’ का सफ़र

प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छता के कार्यक्रम को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन का शुभारंभ किया गया। स्वच्छ भारत मिशन को खुले में शौच से मुक्त करने तथा शहरी और ग्रामीण भारत में व्यापक स्वच्छता उपायों को प्रोत्साहित करने के लिए एक महत्वकांक्षी कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था। पिछले पांच वर्षों में, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अंतर्गत अकाउंटबिलिटी इनिशिएटिव रिसर्च समूह ने इस कार्यक्रम में निधि प्रवाह तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इसके कार्यान्वयन पर जमीनी अध्ययन किया है। आखिर इस नीतिगत उपाय का क्या प्रभाव पड़ा है आईये इसे समझने का प्रयास करते हैं।

स्वच्छता के क्षेत्र में हमारा काम स्वच्छ भारत मिशन के शुभारंभ से काफी पहले शुरू हुआ था। 2012 में, हमने सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान पर एक अध्ययन किया था – यह एक ऐसा समय था जब जनगणना 2011 की संख्याएँ अभी सामने आई ही थीं और वे सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान द्वारा बताए गए लोगों से काफी भिन्न थीं, इसलिए हम अंतराल की सीमा और उनके वित्तीय प्रभावों का विश्लेषण कर रहे थे। हमने ग्राम पंचायतों को दिए जाने वाले पुरस्कार – निर्मल ग्राम पुरस्कार का भी अध्ययन किया, जिसके अंतर्गत पंचायतों ने स्वच्छता पर बेहतर काम किया था। 

दिसंबर 2015 में हमने विशेष रूप से इस कार्यक्रम की जमीनी वास्तविकता को समझने के लिए 5 राज्यों और 10 जिलों के 7500 घरों का दौरा किया। यह इसके शुरुआती दिनों का समय था इसलिए हमने पाया कि जब निर्माण कार्य शुरू हुआ था तो कई शौचालय अधूरे बने हुए थे तथा शौचालयों का उपयोग बहुत सीमित था। लेकिन स्वच्छ भारत मिशन की बड़ी बात यह थी कि शुरूआती दौर में इसका सूचना प्रबंधन प्रणाली (MIS) काफी पारदर्शी और व्यवस्थित था जिसके माध्यम से सरकार, नागरिक समाज तथा लाभार्थी वास्तव में न केवल इसका निधि प्रवाह बल्कि कितने शौचालय बन चुके हैं तथा कितनों को शौचालय प्रोत्साहन राशि (12,000 रूपये/-) प्राप्त हो चुकी है इस सबकी जानकारी उपलब्ध करवाता था।

इस सबसे यह महसूस हुआ था कि यह एक सामाजिक जवाबदेही को प्रोत्साहित करने का एक बेहतरीन प्रयास था। लेकिन दुर्भाग्य से अब काफी सारा डाटा, ख़ास तौर से वित्तीय और अलग-अलग प्रकार का डेटा सूचना प्रबंधन प्रणाली (MIS) पर लम्बे समय तक उपलब्ध नहीं है।

2017 में हमें राजस्थान के उदयपुर जिला प्रशासन द्वारा उनके जिले में इस कार्यक्रम की जमीनी हक़ीकत जानने के लिए अनुरोध किया गया। इस सर्वेक्षण में हमें उन ग्राम पंचायतों की स्वच्छता स्थिति का पता लगाने के लिए आग्रह किया गया था जो पहले से ही बाह्य शौच मुक्त घोषित हो चुकी थीं। अध्ययन का कारण यह था कि 2015 के हमारे सर्वेक्षण आंकड़ों ने उदयपुर जिला को सबसे खराब प्रदर्शन वाले जिलों में से एक दिखाया था, जिले ने कई सूचना अभियान चलाने की कोशिश की थी और इस प्रकार ग्राम पंचायतों को तेजी से बाह्य शौच मुक्त घोषित किया था। इस अध्ययन से जिला प्रशासन स्वयं भी यह समझना चाहते थे कि अधिकारीयों ने किस हद तक इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है तथा किन चीजों पर आगे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है| रिसर्च समूह के तौर पर हम एक ग्राम पंचायत या गाँव को बाह्य शौच मुक्त घोषित करने की पूरी प्रक्रियाओं चाहे वह शौचालय निर्माण से लेकर जागरूकता, निरिक्षण तथा प्रोत्साहन राशि मिलने तक की पूरी गतिविधियों को नजदीकी से जानने के लिए उत्सुक थे।

हमारी यह रिपोर्ट वेबसाइट पर उपलब्ध है, लेकिन सारांश यह था कि सर्वेक्षित ग्राम पंचायतों में से केवल एक ग्राम पंचायत को छोड़कर किसी भी ग्राम पंचायत में 100% शौचालय निर्माण नहीं हुआ था। शौचालय उपयोग के लिए हमने प्रत्येक घर में अलग-अलग सदस्यों से एक प्रश्न पूछा और पाया कि उपलब्ध शौचालयों की उपयोगिता भी कम थी और ज्यादातर प्रचार लिंग आधारित भी देखने को मिला यानी इस बात पर ज़ोर दिया गया कि शौचालय उपयोगिता महिलाओं के लिए प्राथमिक है।

जैसा की आप जानते हैं कि विशेष रूप से ज्यादातर चर्चा स्वच्छ भारत मिशन की सफलता या असफलता पर टिक जाती है। सबसे पहले हमें समझना होगा कि सफलता क्या है?

यदि कार्यक्रम की सफलता, मिशन पर जागरूकता को बढ़ाना है तो निश्चित रूप से अधिक लोग स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम के बारे में जानते हैं और शौचालय निर्माण की गति में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। निश्चित रूप से उन लोगों के लिए जिनको शौचालय पहुँच प्राथमिक बाधा थी। लेकिन इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य सुरक्षित स्वच्छता से इससे पोषण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव से था परन्तु हम-आप इसे माप नहीं रहे हैं और न ही स्वच्छ भारत मिशन संदर्भ से इसके बारे में पर्याप्त बात कर रहे हैं। ।

जैसा कि आप जानते हैं, रिसर्च ने प्रमाणित किया है कि खराब स्वच्छता से आंतों की बीमारियां होती हैं जैसे कि दस्त लगना और पोषक तत्वों के अवशोषण में कमी आने की वजह कुपोषण का कारण बनता है और इस सबसे ज्यादातर छोटे बच्चे प्रभावित होते हैं। इसलिए यह एक निरंतर चक्र है जिसे केवल खुले में शौच को समाप्त करके और स्वच्छता में सुधार करके ही रोका जा सकता है। बेशक, इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की भी आवश्यकता है, लेकिन स्वच्छता मूल कारण है जिसे संबोधित किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री द्वारा पहले से ही जिस पर फोकस किया जा रहा है वह ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन (SLWM) में प्लास्टिक कचरे पर केन्द्रित है। चिंता की बात यह है कि अधिकांश घरों में दो गड्ढों वाले शौचालय नहीं बने हैं जो एक अनिवार्य बनावट है क्योंकि वे मल का सुरक्षित निपटान कर पाते हैं – यहां तक ​​कि हाल ही में किए गए नार्स (Narss) सर्वेक्षण में पाया गया कि 30% से कम घरों में ही दो गड्ढों वाले शौचालय बने थे। इसके बजाय अधिकांश लोगों ने सेप्टिक टैंक, बंद गड्ढे वाले शौचालय आदि का निर्माण किया है। इसलिए इन शौचालयों को खाली करने की आवश्यकता होगी और दुर्भाग्य से हर जगह सरकार के पास मशीनें नहीं हैं। तो अगर ऐसे में स्वच्छता कर्मचारियों या हाथ से मैला उठाने वालों का सहारा लेने की जरुरत पड़े तो यह कानून द्वारा अवैध तथा उनके स्वास्थ के लिए बहुत हानिकारक है।

हर स्तर पर सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) /व्यवहार परिवर्तन संचार (BCC) पर भी ध्यान केंद्रित करना बहुत जरुरी है ताकि स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति लोगों की व्यवहारिकता में सुधार आ सके। यह सुनिश्चित करने की बेहद आवश्यकता है कि हमारे पास अपशिष्ट के निपटान की क्षमता और तंत्र उपलब्ध हैं। 2018-19 के आंकड़े (हमारे बजट ब्रीफ पर उपलब्ध) बताते हैं कि हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश तथा केरल ने ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर अपने कुल स्वच्छ भारत मिशन का लगभग 80% पैसा खर्च करना शुरू कर दिया है।

बेशक हम आधिकारिक डेटा के अनुसार शौचालय निर्माण की बाधा को पार कर रहे हैं। लेकिन हमें उस संदर्भ की वास्तविकता को स्वीकार करने की अत्यंत आवश्यकता है जिसके भीतर हम इन शौचालयों का निर्माण कर रहे हैं। हम इन शौचालयों को कैसे साफ करेंगे? हम ड्रेनेज सिस्टम को कैसे बनाए रखेंगे? जब ये भरेंगे तो सेप्टिक टैंक को कैसे खाली किया जायेगा? 

हमारे उदयपुर अध्ययन से एक ठोस उदाहरण देने के लिए- बीडीओ जो 138 कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अन्य चीजों को छोड़ दिया था। हमने हाल ही में अपने पुराने सर्वेक्षणों में से कुछ गांवों का फिर से निरीक्षण किया और पाया कि बाह्य शौच मुक्त घोषित करने के बाद न केवल निगरानी बंद कर दी गई थी बल्कि लोग अब दुबारा खुले में शौच के लिए जा रहे थे क्योंकि सरकार द्वारा “दबाव” कम हो गया है। 

सरकार को स्वास्थ्य, जल, स्वच्छता और लिंग के संबंध में पर्याप्त रूप से ध्यान देना होगा क्योंकि इन सभी का पोषण और स्वास्थ्य परिणामों पर भी गहरा असर पड़ता है। अतः अब समय आ गया है कि क्रॉस सेक्टोरल लिंकेज पर ध्यान केंद्रित किया जाए यानी ऐसा नहीं हो सकता कि शौचालय बनाना स्वच्छ भारत का काम है, बीमारियों को रोकना स्वास्थ्य विभाग का काम है, तथा उसी तरह जाति से निपटना सामाजिक न्याय मंत्रालय का काम है। इसलिए अलग-अलग विभागों को एक साथ बैठकर बात करनी होगी और भविष्य के लिय ठोस रणनीति बनानी होगी ताकि दूरगामी परिणाम सुखद हों।