संघर्ष से परिणाम तक का सफ़र

मैं अमित कुमार जोगी अलवर जिले का निवासी हूँ तथा 10 वर्षों से इब्तिदा संस्था, अलवर में कार्यरत हूँ| इब्तिदा पिछले 21 वर्षों से अलवर जिले के विभिन्न ब्लॉक में बालिका शिक्षा, आजीविका संवर्धन, सरकारी विद्यालयों के साथ शिक्षण, किशोरी बालिकाओं के लिए जीवन कौशल व कंप्यूटर शिक्षा, खेती व पशुपालन पर कार्य करती आ रही है|

पशुपालन हमारे देश की एक बड़ी आबादी का आजीविका स्रोत है जिसका देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान है| लेकिन आज भी देश के किसान वर्ग के लिए परम्परागत तरीकों से पशुपालन और उन्नत पशुपालन की जानकारी का अभाव एक बड़ी समस्या है| इसकी वजह से पशुओं में उत्पादन क्षमता का कम होना, पशुओं की मृत्युदर अधिक होना जैसी समस्याएं आती हैं और इसका प्रभाव किसान की आजीविका पर पड़ता है|

चूँकि पशुपालन छोटे स्तर पर अधिकतर किया जाता है और परिवार में इस कार्य की अधिकतर जिम्मेदारी भी महिलाओं की होती है अतः संस्था में पशुपालन का कार्य महिलाओं के साथ ही किया जाता है| पशुपालन कार्य के अंतर्गत संस्था में मुख्यतः बकरीपालन और दुशारु पशु गाय व भैंस पालन कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं| इसमें पशुओं में आने वाली बीमारियों की जानकारी, पशुओं की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना, पशुओं का नस्ल सुधार एवं पशु उत्पादों की उचित बिक्री के बारे में जागरूक करना शामिल है|

‘पशु सखी’ और उसकी भूमिका

इस कार्य को बेहतर करने के लिए गाँव स्तरीय एक ऐसी महिला का चयन किया जाता है जो पशुपालन में रूचि रखती हो और स्वयं के पास भी पशु हों| वह कुछ पढ़ी-लिखी हो इसका ध्यान रखा जाता है| चयन के उपरान्त ऐसी महिलाओं को उन्नत पशु प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है और इस सबके बाद उसे ‘पशु सखी’ का नाम दिया जाता है|

‘पशु सखी’ के मुख्य कार्य

गाँव में महिलाओं को उन्नत पशुपालन की गतिविधियों की जानकारी देना और उन्हें लागू करवाना होता है| जिसके लिए ‘सखी’ द्वारा समय-समय पर गाँव स्तरीय पशुपालन प्रशिक्षण आयोजन करवाना, पशुओं को टीकाकरण संबंधी सेवाएं, पशुओं के आवास की सफाई हेतु जानकारी, पशुओं को संतुलित आहार की जानकारी देना शामिल रहता है| इन ‘पशु सखियों’ के साथ मासिक बैठक और उनका क्षमतावर्धन भी किया जाता है|

वर्तमान में अधिकतर ‘पशु सखियाँ’ अपने गाँव में सेवाएं दे रही हैं और साथ ही अब 500 से 3000 रुपये प्रतिमाह की आमदनी भी कर रही हैं|

‘पशु सखियों’ द्वारा किये गए प्रयासों से गाँव में पशुपालन क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं जैसे पशुओं में संक्रामक बीमारियों का कम होना, उनमें उत्पादन क्षमता में वृद्धि होना और पशुओं के बीमार होने पर तुरंत उपचार मिलना आदि|

लेकिन आपको क्या लगता है, ये सब करना क्या इतना आसान रहा है?

चुनौतियां तथा हमारे प्रयास
संस्थागत स्तर पर

गाँव में पढ़ी-लिखी महिलाओं की संख्या न के बराबर होती है और ‘पशु सखी’ के स्तर पर हमें सबसे पहली चुनौती यही रही| गांव की महिलाओं को घर से बाहर न जाने की अनुमति तथा पारिवारिक जिम्मेदारियां अधिक होती हैं| ऐसी परिस्थिति में महिलाओं का गाँव से आवासीय प्रशिक्षण में ले जाना और उन्हें जानकारी देना, संस्था के लिए चुनौती भरा काम था|

  • शुरुआत में हमने गाँव की 35 से 45 वर्ष की अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को चुना
  • प्रशिक्षण स्थल पर कुछ दिन तक महिलाओं के परिवार के सदस्यों को भी साथ में रखा
  • उनकी स्थानीय भाषा में सरल प्रशिक्षण मोड्यूल तैयार किया और स्थानीय भाषा के जानकार प्रशिक्षक तैयार किये गए
  • संस्था कार्यकर्ता ‘पशु सखियों’ के परिवार के सदस्यों से भी लगातार सम्पर्क में रहते थे
महिलाओं के स्तर पर
  • प्रशिक्षण व बैठकों में जाने से उनके घर का काम प्रभावित होना
  • मीटिंग में आने पर गाँव से दूर पैदल चलना व शाम को देरी होने पर परिवारवालों के ताने सुनना
  • महिलाओं द्वारा किये जाने वाली उन्नत पशु प्रबंधन की गतिविधियों की समाज में स्वीकार्यता न होना
  • जब ‘पशु सखी’ किसी पशु का प्राथमिक उपचार करती तो गांव के लोग उसका मज़ाक बनाते हुए उसे डॉक्टर कहकर पुकारते और कहते कि हमें भी दवा दे दो| इस कारण बहुत सी ‘पशु सखियों’ ने काम करना छोड़ दिया|

इसके लिए हमने संस्था के द्वारा गाँव-गाँव में पशुओं के कैंप आयोजित करवाए जिसमें ‘पशु सखियों’ की सक्रीय भागीदारी होती थी| उससे गाँव में ‘पशु सखी’ की पहचान बनी और लोगों ने उसके कार्य को स्वीकारना शुरू किया| जिन सखियों को बैठकों में आने-जाने से ज्यादा परेशानी होती थी, उनका संस्था के कार्यकर्ताओं के द्वारा घर तक छोड़ा जाता था|
वर्तमान में लगभग 300 सखियां विभिन्न गाँवों में सेवाएं दे रही हैं तथा अब सामुदायिक सन्दर्भ व्यक्ति (सी.आर.पी.) के रूप में अन्य गाँव में जाकर उन्नत पशु प्रबंधन के प्रशिक्षण की सेवाएं भी दे रही हैं|

‘पशु सखी’ के इस मॉडल की शुरुआत सर्वप्रथम ‘इब्तिदा’ संस्था ने ही की थी और अब अन्य संस्थाएं भी इसी मॉडल पर काम कर रही हैं| संस्था ने अपनी प्रशिक्षण की सेवाएं राजस्थान के दुसरे जिलों ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिमबंगाल में भी दी हैं| मेरे लिए यह बहुत ख़ुशी की बात है कि इस कार्यक्रम की मुख्य भूमिका में मेरी भागीदारी रही है| इस कार्य की सफलता में मुझे मेरे साथी दिनेश नायक और हमारी संस्था के निदेशक राजेश सिंघी जी का हमेशा सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहा है।

संस्था ने इस मॉडल के सफल हो जाने के बाद अन्य क्षेत्रों में भी सखियाँ बनाने का काम तेज गति से किया है| आज इब्तिदा की ‘पशु सखियों’ की पहचान देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बनी है जिसमें उदाहरण के तौर पर अमेरिका की हाइफ़र इंटरनेशनल संस्था ने भी इब्तिदा संस्था की इन ‘पशु सखियों’ पर एक डॉक्यूमेंटरी बनायी है|

अंत में

अंत में बस यही कहना चाहूँगा कि कोई भी कार्य क्षेत्र हो जब भी हम-आप समाधान की तरफ जाते हैं तो उसमें बहुत सारी चुनौतियां या नकारात्मक लोग हमारे काम के बीच आते हैं| अब यह तय हमें करना है कि क्या बाधाओं या सामजिक कुरीतियों की वजह से हम अपना सफ़र बीच में छोड़ दें या फिर समाज की बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध रहें?

(अमित कुमार जोगी राजस्थान में इब्तिदा संस्था में काम करते है । दिसंबर 2019 में उन्होंने अलवर में ‘हम और हमारी सरकार’ कोर्स में हिस्सा लिया था।यहाँ लिखे गए सारे विचार केवल लेखक के हैं और किसी भी तरह से लेखक की संस्था या अकॉउंटबिलिटी इनिशिएटिव के विचारों को व्यक्त नहीं करते हैं।)