विकेंद्रीकरण में अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष निर्वाचन

भारत में स्थानीय संस्थाओं को 73वें और 74वें संवैधानिक संसोधन द्वारा संवैधानिक दर्जा दिया गया जो कि लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था | जब भी कोई गंभीर समस्या आती है तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उभरता है कि स्थानीय ग्रामीण निकाय इतने कमजोर क्यों है ? ग्रामीण संस्थायें बहुत सारी है एवं उनकी शक्तियों का परस्पर उल्लेख भी है | शासन के इस स्तर पर व्यापक सुधारों की आवश्यकता है और उन सुधारों में कुछेक मुद्दों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है | 

राजस्थान में ग्रामीण स्तर पर सरपंच को प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुना जाता है और ऐसा शायद इसलिए किया जाता है की जनता और चुने हुए प्रतिनिधि के बीच परस्पर संवाद बना रहे एवं किसी प्रकार का खालीपन नहीं आए | हाल ही में राज्य के पंचायती राज चुनावों को लेकर राजनैतिक दलों के बीच चर्चा का विषय रहा की “अध्यक्ष का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से कराया जाये अथवा अप्रत्यक्ष रूप से?’’

लोकतंत्र के लिहाज से स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों को शक्ति न देकर चुने हुए प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधि को शक्ति देना ज्यादा उचित होगा | इसलिए हम लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष निर्वाचन की खूबियों एवं खामियों को समझने, संवाद करने की जरूरत है !

अप्रत्यक्ष निर्वाचन

भारत में हम लोग केंद्र, राज्यों के स्तर पर हमारा लोकसभा सदस्य, विधानसभा सदस्य चुनते है एवं जिस राजनैतिक दल को बहुमत मिलता है वह अपने दल का नेता चुन कर सरकार बनाते है , जिन्हें हम लोग प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री कहते है | राजस्थान के ग्रामीण निकाय के ऊपर के दो स्तरों परस्पर जिला परिषद एवं पंचायत समिति में हम यही प्रक्रिया अपनाते है, परन्तु ग्राम पंचायत के स्तर पर हम प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति अपनाते है | अप्रत्यक्ष निर्वाचन की लोग सबसे बड़ी खामी यह बताते है की इससे खरीद-फ़रोख्त की राजनीती को बढ़ावा देती है | इस प्रणाली से राजनितिक अस्थिरता भी बढती है | इसकी  सबसे अच्छी खासियत यह है की इससे sशक्तियां एक व्यक्ति पर केन्द्रित नहीं होती है |

प्रत्यक्ष निर्वाचन

विश्लेषको का इसके पक्ष में लोग तर्क देते है की जन प्रतिनिधि एवं जनता के बीच सीधा संवाद बनता है एवं जनता की समस्याओं का बेहतर समाधान करता है | लोकतंत्र के उतरदायित्वों का पालन भी बेहतर तरीके से कर पाते है | इसके विरुद्ध विश्लेषक तर्क देते है की इससे शक्तियां एक व्यक्ति के पास केन्द्रित हो जाती है जिससे मनमानी एवं तानाशाही का डर रहता है, जो की लोकतान्त्रिक मूल्यों के खिलाफ है |

अब विचारणीय बिंदु यह की राजस्थान में सरपंच एवं वार्ड पंच के निर्वाचन की वर्तमान प्रक्रिया किस हद सही एवं ख़राब है |

लोकतान्त्रिक मूल्यों के लिहाज से इस पर चर्चा की जानी चाहिए | ग्राम पंचायत में लोगों का पहला जनप्रतिनिधि वार्ड पञ्च होता है एवं सबसे ज्यादा सरोकार जनता का उन्ही से होता है | लेकिन क्या वार्ड पञ्च के उचित शक्तियां होती है ? इतने लोगों में से केवल एक व्यक्ति के पास शक्तियों का केंद्र बना देना ठीक है ? पंचायत के कार्यों में कितनी पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता रहती होगी ? जनता का जुडाव उनके प्रतिनिधियों के साथ भागीदारी कितनी रहती होगी ?