‘महिलाओं को मिले उनका संवैधानिक अधिकार’- महिला दिवस विशेष

मैं प्रेमा धुर्वे पिछले 5 वर्षों से आजीविका ब्यूरो संस्थान से जुड़ी हूँ जोकि राजस्थान के उदयपुर, बांसवाड़ा और डूंगरपूर जिले में लगभग 7000 हजार प्रवासी परिवारों की महिलाओं के साथ काम कर रही है| हम खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य पोषण, स्थानीय रोजगार, लिंगभेद परिवार मे बराबरी और पंचायती राज व्यवस्था मे महिलाओं की भूमिका बढ़ाने पर काम कर रहे हैं|

आजीविका ब्यूरो संस्था द्वारा परिवारों को सशक्त और संगठित करने हेतु ‘सशक्तिकरण कार्यक्रम’ की शुरुआत की| संस्था पलायन के मुद्दे पर काम कर रही है तो जाहिर है कि स्थानीय रोजगार जैसे नरेगा कानून, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य व पोषण को हमने काम में जोड़ा गया|

इसके लिए हमने हर पंचायत मे 8 से 10 महिला समूह बनाए गए हैं जिन्हें हम ‘उजाला समूह’ कहते हैं ये स्वयं सहायता समूह से अलग हैं| गाँव स्तरीय समूहों में 15 से 25 महिलाएं हैं जिसमें पूरे फला (20 से अधिक घरों का समूह) के परिवारों को जोड़ा जाता है| इनकी महीने में 1 बैठक होती है तथा यह ऐसा मंच है जिसमें महिलाएं एक दूसरे के सुख-दुख की बातें, हंसी-मंजाक, सहयोग और सरकारी योजनाओं पर चर्चा करती हैं|

उजाला समूह समय-समय पर संगठन के सदस्यों की क्षमतावर्धन करते हैं तभी ये संगठन पंचायत स्तर पर योजनाओं और समस्याओं को लेकर पैरवी बेहतर तरीके से करते हैं| हमारे समूह ग्राम सभा में भागीदारी देते हैं तथा नरेगा योजना के तहत काम की मांग करना हो तो समूह कि महिलाओं के साथ आवेदन करने पंचायत जाते हैं तथा उसकी रसीद लेते हैं|

14वें वित्त आयोग के तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज ढाँचे के विकास हेतु शत प्रतिशत राशि ग्राम पंचायतो को सीधे हस्तांतरित करना तय किया गया| इसके लिए जमीनी स्तर पर नागरिकों के बुनियादी न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति के लिए राजस्थान सरकार ने ग्राम पंचायत विकास योजना को नारा दिया– आपणी योजना आपणों विकास’| 2019 के ख़त्म होने से पहले सरकार को इस योजना को आगे बढ़ाने की ज़रुरत महसूस हुई तो एक आदेश निकाला गया कि पंचायतों में महिला शक्ति समूह बनाए जायेंगे| महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम के तहत महिलाओं को ध्यान में रखते हुये कार्यक्रम की शुरुआत से ही संगठनात्मक ढाँचा तैयार करने पर ज्यादा ध्यान दिया गया| इस दौरान हमने 7000 आदिवासी महिलाओं के साथ काम किया जोकि गाँव स्तरीय महिला संगठनों से जुड़ी हुई हैं| इन महिलाओं ने पिछले कुछ सालों में अपने गाँव में नरेगा के तहत पुरे दाम, राशन की नियमितता पर काफी पहल की हैं| यह महिलाएं अपने आसपास होने वाली महिला हिंसा के खिलाफ भी आवाज़ उठाती आयी हैं तथा समय-समय पर गरीब परिवार जोकि प्रवास पर निर्भर हैं, उन परिवारों का भी सहयोग करती रही हैं|

हमारे पास महिला शक्ति समूह से जुड़ना और ग्राम पंचायत विकास योजनाओं को बेहतर कार्यान्वयन के लिए इन महिला संगठनों को एक सलाहकार की भूमिका निभाने का एक अच्छा अवसर था| इन महिला शक्ति समूहों को एक और शक्ति ‘आपणी योजना आपणों विकासमिली जिसके तहत पंचायतों को महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए 40 प्रतिशत बजट खर्च करना अनिवार्य था| इसलिए हमारी ओर से इन समूहों को मजबूत बनाने के लिए शक्ति समूहों व लीडर महिलाओं के साथ महिला सभाओं व शक्ति समूहों की महत्वता शिक्षण बैठकें की गई| बैठकों मे कई खट्टे-मीठे अनुभव रहे और इस काम को आगे ले जाने के लिए हमारे द्वारा तैयार रणनीति काफी उपयोगी रही| हमने समुदाय कि महिलाओं को हर स्तर पर आगे रहकर काम का स्वामित्व लेने के लिए प्रेरित किया| इससे यह भी निश्चित होता है कि इस तरह का काम सिर्फ एक बार का प्रयास बनकर ना रह जाए, बल्कि समुदाय द्वारा अपने हित के लिए बार-बार इस प्रकार के रणनीतियों का प्रयास किया जाना चाहिए|

लोहागढ़ पंचायत में एक महिला समूह के समय ऐसी ही एक घटना देखने के लिए मिली। कंका बाई, अपनी पंचायत में एक और हैंडपंप की मांग रख रही थी| सचिव ने कठोर तरीके से उनसे पूछा, “आपके गाँव में दो हैंडपंप के बीच में कितनी दूरी है?”  कंका बाई ने धीरे से कहा की “दूरी तो नहीं पता पर 1 घंटा लगता है”| इस पर उन्हें सचिव द्वारा तपाक से चुप करा दिया गया और बैठने को बोला गया| हमें कई बार देखने को मिलता है कि अधिक सत्ता पुरुषों के पास होने पर वे महिलाओं को आसानी से अनसुना कर कर देते हैं, जबकि वे भी घर-परिवार, गांव, समाज की समस्याओं को बेहतर समझती हैं| हमने देखा है कि वे अपने पंचायत से बेहतर स्वास्थ्य, सड़क, शिक्षा, हिंसा मुक्त समाज, पर्यावरण को बचाने, नशा मुक्त समाज का निर्माण, समाज मे आखिरी वंचित व्यक्ति तक मूलभूत सुविधाये पहुंचाने पर बात करती हैं इसलिए बिना किसी भेदभाव के महिलाओं के मत को आगे रखना भी जरूरी हो गया है क्योंकि वो भी तो इसी समाज का हिस्सा हैंl

लसाड़िया ब्लॉक की एक पंचायत में रहने वाली रामी (बदला हुआ नाम) अपने 5 बच्चों के साथ रहती हैl कुछ साल पहले पति के गुजर जाने के बाद सारी ज़िम्मेदारी रामी के ऊपर आ गयाl रामी जैसे तैसे इस मुश्किल वक्त से गुजरते हुए जब गाँव में ही किसी के यहाँ मजदूरी के लिए जाती पर मजदूरी कम मिलने से परिवार का गुजारा नहीं चला पा रही थीl उसके यहाँ बारिश होने पर पहले मक्का का फसल हो जाता था जिससे थोड़े समय के लिए उनका गुजारा चल पड़ता था| पति के जाने के बाद अब खेती करने के लिए किसी पुरुष की जरूरत थी तो ऐसे में रामी ने अपनी बेटी के साथ ही खुद हल चलाने का काम शुरू कियाl पर पंचायत को ये बात रास न आई और उसे बैठक बुलाकर कहा कि एक महिला कैसे हल चला सकती है?

एक तरफ समाज और दूसरी तरफ रामी के ऊपर परिवार की जिम्मेदारी, किसी से कोई मदद नहीं मिल पा रही थी| अंत मे रामी ने पंचायत के सामने खुद का निर्णय सुना दिया कि या तो मेरे परिवार को जहर दे दो या फिर खेती में मदद करें? समाज के साथ इसी तरह से जूझते हुए वह अपना परिवार मुश्किल से चला रही थीl

करीब दो साल बाद हम लोग रामी से मिले, उसकी इस घटना सुनकर बहुत दुःख हुआ इसलिए कुछ समाधान निकालने के बारे में सोचने लगे| रामी से बात करते करते पता चला कि नरेगा योजना के तहत उसके पास जॉब कार्ड भी बना है पर उससे कोई फायदा नहीं मिल पायाl उसके बाद हमने उसे पूरी जानकारी दी, हमने रामी के साथ पंचायत में जाना शुरू किया तथा बार-बार जाकर सरपंच और सचिव को रामी को काम देने को कहा क्योंकि वह उसका कानूनी हक़ है| वर्तमान में रामी मनरेगा में काम करने लगी है और पंचायत सरपंच और सचिव से नियमित काम मांगती है बल्कि मांग के लिए उनसे रसीद माँगना शुरू कर दिया है जिससे अब सरपंच और सचिव भी उसको काम देना शुरू कर दिए हैं|

वर्तमान समय में भी यह देखने को मिलता है कि संवैधानिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए महिलाओ को अपने द्वारा निर्वाचित लोगों से बात करने के लिए संगठनात्मक ताकतों के बल पर अपनी बात कहनी पड़ती हैl बहुत सी चुनौतियों के बीच भी वे अब धीरे-धीरे सशक्तिकरण की सही परिभाषा को समझ पा रही हैं, वे खुद निर्णय लेकर खुद को आत्म-निर्भर बनाकर खुद को आगे ला रही हैl लेकिन आज यह पूरे समाज का दायित्व है कि वे भी इस बराबरी में उनके साथ सहयोगी बनकर राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक समानता के प्रति उन्हें सहयोग करे तभी सही मायने में उनके लिए संवैधानिक अधिकार सार्थक हो पाएगाl