बाल संरक्षण सेवाएँ

दोस्तों कुछ माह पहले मुझे जयपुर स्थित एक गैर सरकारी संस्थान द्वारा संचालित बाल आश्रय गृह में जाने का मौका मिला | वहां मैंने देखा की उसमें लगभग 40-50 बच्चे ठहरे हुए है जिनकी उम्र लगभग 5-18 साल की है | उनमें से एक बच्चा राहुल (काल्पनिक नाम) जिसकी उम्र लगभग छ: साल थी, ने बताया की वह बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का रहने वाला है | उसके माता-पिता ने 10 हजार सालाना मज़दूरी  में ठेकेदार के हवाले कर दिया है | ठेकेदार राहुल को लेकर जयपुर आ गया और यहाँ उसे भट्टा बस्ती में चूड़ी व्यवसाय के कार्य में लगा दिया | राहुल से प्रतिदिन 12-16 घंटे निरंतर कार्य करवाया जाता एवं नींद आने पर उसे गर्म लोहे के सरिये से दागा जाता | संस्था के समन्वयक ने बताया की राहुल उन्हें  बेहोशी की हालत में मिला | वहां से लाकर पहले इसका इलाज करवाया गया और  बाद में उसके  घरवालों का पता लगाया | 

उस बाल आश्रय गृह में इसी प्रकार के बच्चे रहते है | संस्था के समन्वयक ने बताया की पहले वह लोग इसी प्रकार का बालिका आश्रय गृह भी संचालित करते थे, लेकिन सरकार की तरफ से समय पर पैसा नहीं मिलने की वजह से उन्होंने उसे बंद कर दिया था | उन्होंने बताया की “हमें पैसा एक से डेढ़ साल के बाद मिलता है इसलिए पहले इतना खर्च करना हमारे लिए बहुत ही मुश्किल है |”

भूमिका

 भारत सरकार ने वर्ष 2013 में बच्चों के अधिकारों एवं संरक्षण को सुनिश्चित करने हेतु नई “राष्ट्रीय बाल नीति 2013” अपनाई | हालांकि यह नीति बच्चों को राष्ट्रीय संपदा मानकर इनके अधिकारों पर जोर देती है लेकिन देश में केन्द्रीय एवं राज्यों सरकारों के बजट का आंकलन किया जाये तो इनके विकास एवं संरक्षण हेतु पर्याप्त प्रयास नहीं किये जा रहे है |

अगर हम राजस्थान राज्य की बात करे तो “जनगणना 2011” के अनुसार करीब 2.99 करोड़ बच्चे 18 वर्ष से कम आयु वर्ग के है जो की राज्य की कुल आबादी का करीब 43.58 प्रतिशत है | राज्य में बच्चों को ध्यान में रखते हुए केंद्र एवं राज्य द्वारा विभिन्न विभागों के माध्यम से योजनायें संचालित की जा रही है जो मुख्य रूप से बच्चों की शिक्षा, संरक्षण, स्वास्थ्य, बाल विकास एवं पोषण से सम्बंधित है 

भारत सरकार के बाल संरक्षण सेवाओं के लिए प्रमुख कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण के लिए निवारक, क़ानूनी देखभाल एवं पुनर्वास सेवाएँ प्रदान करना है।  इस योजना में मुख्य रूप से चार प्रकार की सेवाएँ प्रदान की जाती है :

  • संस्थागत सेवाएँ: Child Care Institutes (CCIs) के माध्यम से देखभाल एवं संरक्षण के कानून के संघर्षरत बच्चों को की देखभाल, आश्रय एवं पुनर्वास उपलब्ध कराना! CCIs में ओपन शेल्टर, चिल्ड्रेन होम्स एवं विशेष दत्तक ग्रहण एजेंसीज शामिल है !
  • परिवार आधारित गैर-संस्थागत देखभाल : जेजे अधिनियम में बच्चों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन का प्रावधान है जिसमे स्पांसरशिप, फोस्टरकेयर, अडॉप्ट एवं आफ्टरकेयर शामिल है ! आफ्टरकेयर सेवाओं के लिए 18 से 21 के बीच के बच्चों को प्रदान की जाती है !
  • “चाइल्डलाइन” के माध्यम से आपातकालीन आउटरीच सेवाएँ : “चाइल्डलाइन” 24 घंटे उपलब्ध एक आपातकालीन आउटरीच फोन सेवा है, जिसका उद्देश्य आवश्यकता वाले बच्चों के लिए देखभाल, सुरक्षा, दीर्घकालीन देखभाल एवं पुनर्वास सेवाएँ मुहैया करवाना !
  • आवश्यकता आधारित एवं नवीन हस्तक्षेपों के लिए अनुदान सहायता : राज्यों की भोगोलिक, सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर अनुदान सहायता दी जाती है !

वित्तीय स्थिति

भारत सरकार का बाल संरक्षण सेवाओं के लिए आवंटन बजट कम है लेकिन निरंतर बढ़ रहा है | योजना के लिए वित्त वर्ष 2017-18 में 648 करोड़ रुपये आवंटित किये गए थे  जो की वित्त वर्ष 2018-19 में 43 प्रतिशत बढ़कर 925 करोड़ रुपये हो गया ! वित्तीय वर्ष 2019-20 में आवंटन में और वृद्धि हुई और कुल 1350 करोड़ रुपये आवंटित किये, जो की विगत वर्ष से 46 प्रतिशत अधिक था|

राज्यवार आवंटन एवं खर्च की स्थिति:

  • वित्तीय वर्ष 2018-19 में भारत सरकार द्वारा जारी की गई राशि के अनुपात में राजस्थान ने 100 प्रतिशत व्यय किया  
  • मार्च 2019 तक राजस्थान ने CCIs गतिविधि के तहत SAAs में 18 प्रतिशत, ओपन शेल्टरहोम्स के लिए 17 प्रतिशत एवं चिल्ड्रेन होम्स के लिए 65 प्रतिशत वितीय सहायता उपलब्ध करवाई गई|
  • राजस्थान में मार्च 2019 तक प्रति CCIs लाभार्थियों की औसत संख्या 23 थी, जो की भारत में सबसे कम थी ! इस दौरान राजस्थान में CCIs की कुल संख्या 131 थी|
  • राजस्थान में मार्च 2019 तक कुल CCIs के हिस्से के अनुपात में में CPSs के बाल गृह लाभार्थियों का 83 प्रतिशत था, ओपन शेल्टर होम्स के लाभार्थियों का 14 प्रतिशत एवं SAAs के लाभार्थियों का 3 प्रतिशत था|
  • 2016 से 2017 के बीच में राजस्थान राज्य में बच्चों के खिलाफ अपराधों के पंजीकृत मामलों की संख्या में 28 प्रतिशत का अंतर था|

उपरोक्त बातों को जानने के बाद हमें लगता है की केंद्र एवं राज्य सरकारों को बाल संरक्षण के मुद्दों पर अपने बजट आंवटन, खर्चों की प्रवृतियों पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है | ऊपर की कहानी से हमें ज्ञात होता है की इस प्रकार के गृहों को और बढाया जाना चाहिए ना की पैसों के अभाव में उनको बंद किया जाना चाहिए | जब सरकार द्वारा संचालित गृहों को अग्रिम राशि जारी की जाती है तो फिर गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा संचालित गृहों की राशि प्रतिपूर्ति के तौर पर एक से डेठ साल बाद क्यों जारी की जाती है ? बाल संरक्षण के लिए सरकारों द्वारा किये जा रहे प्रयास काफी है ?