बच्चों की शिक्षा में सुधार लाने की ओर एक अनोखी साझेदारी

मैं अंतिम कुमार सिन्हा, वर्ष 2005 से प्रथम संस्था के अलग–अलग प्रयासों के माध्यम से बच्चों की बेहतर शिक्षा देने में और इसकी बारीकियों को समझने में जुड़ा हुआ हूँ | प्रथम, जिसका उद्देश्य “हर बच्चा स्कूल में हो और अच्छे से पढ़े“ इसके लिये संस्था कई तरीकों से अपने उद्देश्य प्राप्ति हेतु प्रयासरत है| 

अगर सुपौल जिला की बात करें तो यहाँ बिहार शिक्षा परियोजना एवं प्रथम के साझा प्रयास से विशेष शिक्षण कार्यक्रम संचालित किया गया है, जिसके तहत सभी विद्यालयों में कक्षा 3, 4 एवं 5 के बच्चों का मूल्यांकन कर विशेष कक्षा का संचालन करवाना है| जिससे सम्बंधित कक्षा का कोई बच्चा भाषा में, कहानी से नीचे का ना हो और साथ ही गणित में सभी बच्चों को जोड़/घटाव/गुणा एवं भाग की क्रिया आनी चाहिए|

दूसरा कार्यक्रम जनशिक्षा एवं प्रथम के साझा प्रयास से संचालित है जिसका नाम है “कोई बच्चा पीछे नहीं माता भी छूटे नहीं” जिसका उद्देश्य सम्बंधित केन्द्रों के सभी बच्चों को स्कूल की मुख्य धारा से जोड़ते हुये वर्ग सापेक्ष शिक्षा उपलब्ध कराना है| इन दोनों कार्यक्रमों में हमारा सीधा संवाद शिक्षकों एवं पदाधिकारियों के साथ होता हैं और केंद्र बिंदु बच्चा होता है| 

हम लोग 2013 से लगातार सरकार के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं और उसका परिणाम भी देखने को मिला है| लेकिन “असर” रिपोर्ट जो सालाना शिक्षा के वर्तमान स्थिति से अवगत कराती है जिससे पता चलता है कि आज भी कक्षा 3,4 एवं 5 के लगभग 50 प्रतिशत बच्चों को दूसरी कक्षा की पाठ्य पढ़ने में दिक्कत है| जो दिन प्रतिदिन एक चिंता का विषय बनता जा रहा तो ऐसे में केवल सरकारी तंत्र पर ही ज़ोर लगाना शायद कम पड़ सकता है| हम लोग जब भी ज़िला स्तरीय या प्रखंड स्तरीय शिक्षकों या प्रधान शिक्षक की बैठक करते हैं तो इन लोगों से भी सुनने को मिलता है कि अच्छे परिणाम ना आने का कारण अभिभावक भी हैं जब तक वह सामने निकल कर नहीं आयेंगे वह भी हमारी तरह नहीं सोचेंगे तब तक अच्छे परिणाम निकल कर नहीं आने वाले| 

इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए इस साल सभी साझेदारियों के साथ–साथ एक नई साझेदारी हमने जीविका संस्था के साथ की है| जीविका, जो गरीबी उन्मूलन पर फोकस कर जमीनी स्तर पर महिलाओं को आर्थिक एवं सामजिक रूप से सशक्त करने के मामले में एक बड़ी संस्था मानी जाती है| अतः इसी को ध्यान में रखते हुए हमने इनके अपने बाकी अन्य मुद्दों के अलावा बच्चों के शिक्षण स्तर को भी इनके साथ बैठकर शामिल किया है ताकि दीदियाँ बच्चों की शिक्षा के प्रति भी जागरूक हों|

हमने यह साझेदारी  क्यों की?

  • दीदियों को अपने बच्चों का पढ़ने का स्तर पता हो 
  • स्तर पता होने के बाद दीदियाँ स्कूल जाएँ शिक्षकों से बात करें, अगर बच्चा कहीं कोचिंग ले रहा हो तो संबंधित शिक्षक से बात करें 
  • दीदियाँ स्वत: क्या कर सकती हैं यानी जो घर में या गाँव में कोई पढ़ा लिखा हो उसको कहकर अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए मोटीवेट करना जिससे बच्चों के स्तर में जल्द सुधार हो 

यह साझेदारी कैसे चलती है?

जीविका द्वारा सम्बंधित प्रखंड के सभी संकुल स्तर संघ (CLF) में प्रथम का 1-1 सदस्य दिया गया है, जो की कम्युनिटी मोबिलाईजर (CM), जो जीविका संस्था के सबसे ज़मीनी स्तर पर काम करती हैं, उनके साथ मिलकर साप्ताहिक आयोजित होने वाली, स्वयं सहायता समूह की बैठक में जा कर उद्देश्य सम्बंधित मुद्दे पर बात करते हैं । 

  • किस तरह से वह अपने बच्चे के पढ़ने का स्तर पता कर सकती हैं। 
  • किस तरह वह बच्चे का स्तर को समझते हुए स्कूल जाकर शिक्षक एवं प्रधान से संवाद करें कि उनके बच्चे को कक्षा अनुसार पढ़ना नहीं आता है। 
  • किस तरह आसानी से वे भी अपने बच्चों का रोज़ाना कॉपी जांच कर सकती हैं, कि उनका बच्चा आज स्कूल गया तो कुछ पढ़ा या नहीं। 
  • किस तरह वह सुबह–शाम अपने बच्चों को पढ़ने में मदद कर सकती है। 
  • इसके अलावा बहुत ऐसी खेल गतिविधियों को दीदियों के साथ करके दिखाया जाता है ताकि उसे वह अपने बच्चों के साथ कर सकें। 
  • कुछ खेल गतिविधियाँ दीदियों से भी सम्बंधित होती हैं जिसमें कैसे दीदियाँ आधार कार्ड के महत्व को समझ सकें, मोबाइल चला सकें, नंबर सेव कर सकें, शिक्षा सेवक का केंद्र विजिट कर सकें। 

स्कूलों में जाकर क्या पता करती हैं?

  • सप्ताह में एक बार या 15 दिनों में सम्बंधित दीदियों के साथ जिसका बच्चा पढ़ता है, उनके साथ कम्युनिटी मोबिलाईजर (CM) एवं अध्यक्ष की उपस्थिति में दीदियाँ स्कूल जा कर अपने बच्चों के पढ़ने के स्तर को लेकर मुख्याध्यापक एवं अन्य शिक्षकों से संवाद करती हैं| इसके अलावा उनसे बात करती हैं कि आखिर कैसे और कब तक उनके बच्चों को अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ना आना चाहिए| 
  • कितनी दीदियाँ इस सप्ताह स्कूल गई या नहीं गई, स्कूल गई तो क्या हुआ, कैसा लगा इस सबको लेकर दीदियों की अपनी साप्ताहिक बैठक में बात की जाती है| 

इस प्रोग्राम में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?

  • हम लोग हमेशा ही सरकारी तंत्र एवं शिक्षकों के बीच कार्य करते हैं तो ऐसे में एक मिक्स समूह के साथ कार्य करना थोड़ा चुनौती पूर्ण रहता है। 
  • अपने हर एक उदाहरण को उनके लेवल के अनुसार ढालना एवं उनकी भाषा में रखना कई बार कठिन कार्य लगता है। 
  • सभी दीदियों का एक समय में एक स्थान पर आना और कम समय में अपनी बातें रखना यह भी एक बड़ी चुनौती रहती है, क्योंकि दीदियों को अपने घर के काम में भी समय देना पड़ता है।  
  • शुरुआत में दीदियों की हिचकिचाहट को तोड़ना और उन्हें अपनी बात रखने के लिए प्रेरित करना काफी चुनौती पूर्ण था। 

इस प्रोग्राम के किस तरह के परिणाम देखने को मिल रहे हैं?

जीविका एवं प्रथम की साझेदारी से आज दीदियाँ यह समझ चुकी हैं कि, समूह बचत के अलावा उन्हें अपने बच्चों के शिक्षण स्तर पर भी उतना ही ध्यान देना है| आज दीदियाँ अपने बच्चों के शिक्षण स्तर को जानने के लिए सीधे तौर पर शिक्षक से बात करती हैं, तथा आज यहाँ की ज्यादा से ज्यादा दीदियों को अपने बच्चों का पढ़ने का स्तर पता है| अब दीदियाँ इसको लेकर अलग–अलग स्तर पर बात करती हैं, डिमांड करती हैं| सुबह–शाम इन गांवों में पढ़ने के लिए एक अलग माहौल है, तथा दीदियाँ अब अपने बच्चों की स्वत: कॉपी जांच करती हैं| दीदियों की देखरेख में लाइब्रेरी समूह का संचालन होने के कारण दूसरे प्रखंडों से यहाँ का समूह ज्यादा सक्रीय है| दीदियों के आगे आने से स्कूली वातावरण एवं कोचिंग सेंटर व शिक्षा सेवकों के केन्द्रों में काफी बड़ा बदलाव आया है|   

महिलाएं हमारे समाज का एक अहम हिस्सा हैं, इसलिए मेरा मानना है कि अगर महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा सशक्त किया जाये तो शिक्षा के साथ-साथ समाज में हर प्रकार की कमियों को आसानी से सुधारा जा सकता है|

(अंतिम कुमार सिन्हा वर्तमान में प्रथम में ज़िला कार्यक्रम समन्वयक के तौर पर बिहार के सुपौल ज़िले में काम करते हैं)