पंचायतों को सशक्त क्यों होना चाहिए?

ग्राम पंचायत की आत्मा तथा स्थानीय स्वशासन का सदन ग्राम सभा है | यही नहीं ग्रामसभा लोकताँत्रिक विकेंद्रीकरण का प्रथम सोपान है | गाँधी जी का सपना था कि भारत में एक ऐसी व्यवस्था हो जंहा लोगों द्वारा सरकार चलाई जाए और उन्होंने देश के विकास में ग्रामीण जनों की सहभागिता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा था कि, “सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठ कर 20 आदमी नहीं चला सकते हैं, वह गाँव के लोगो द्वारा चलाई जानी चाहिए” | भारत में समय – समय पर विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए कई समितियां गठित की गई | चाहे वह अशोक मेहता समिति हो या फिर बलवंत राय मेहता समिति, जिसमें त्रि- स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश की गई है|

भारत में पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना 24 अप्रैल 1992 में की गई थी | इसी के साथ 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन के बाद स्थानीय सरकार के महत्व की चर्चा की गई है, जिसमे बहुत सारे कार्य और दायित्व स्थानीय सरकार को दिये गये हैं | 73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसके तहत पंचायतों को शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, जलप्रबंधन और गरीबी जैसे 29 विषय सौपे गए|

अगर हम बात करें राजस्थान और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों की तो वहाँ के पंचायतों को बहुत सारी शक्तियाँ दी गई हैं, जैसे कुछ कर वसूलने की शक्तियां| परंतु अगर बिहार की बात करें तो यहाँ पंचायतो को कर वसूलने की शक्ति प्रदान नहीं की गई है | पंचायती राज विकेंद्रीकरण सूचकांक के आकड़ों के आधार पर भी इसे देखा जा सकता है | बिहार में केवल 0.7 % ग्राम पंचायतों के पास कर वसूलने की शक्ति है जो सबसे कम है | बिहार के तुलना में उड़ीसा में यह आकड़ा 54.5% है | यदि आरक्षण की बात करें तो बिहार ऐसा प्रथम राज्य है जहां महिलाओं को 50% आरक्षण देने का काम किया है|

ग्राम पंचायतों के कार्य ( धारा-22) में कहा गया है कि पंचायत के ज़िम्मे 31 कार्य है, जिसमें से सामान्य कार्य के रूप में पंचायत अपने क्षेत्र के लिए पंचायत विकास कार्य योजना बनाएगी और इसके साथ वार्षिक बजट भी अनिवार्य कर दिया गया है | बिहार के अलावा अन्य राज्यों की स्थिति से भी पता चलता है कि अभी भी पंचायतों में अधिकतर कार्य केंद्र एवं राज्य प्रायोजित होते हैं | पंचायतें अपनी ज़रूरतों के अनुसार कार्य नहीं कर पाती हैं और इसका खामियाज़ा वंहा पर रह रहे लोंगो को उठाना पड़ता हैं | उदहारण के लिए राजस्थान और केरल ऐसे राज्य हैं जिन्हें कर लगाने एवं वसूलने से लेकर खर्च करने की स्वंत्रता है|

पंचायत के सशक्त होने से क्या हो सकता है ?
गाँव के विकास की योजनाओं को लागू करने में गाँव के लोंगो की सक्रीय भागीदारी होगी | योजनाओं का आकंलन गाँव के लोगों के द्वारा ही किया जायेगा और योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी भी तरह की परेशानियों का हल गाँव के लोग खुद ही ढूंढेंगे | केंद्र और राज्यों के द्वारा दी गई धन राशि का सही इस्तेमाल किया जा सकेगा | कामों के प्रति पंचायतों कि जबाबदेही और पारदर्शिता बढ़ जायेगी | इसलिए पंचायत व्यवस्था जितनी मज़बूत होंगी, उतना ही लोकतंत्र मज़बूत होगा और पंचायत में रह रहे आखरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुंचेगा |

पंचायतें सशक्त कैसे हो सकती हैं?
सशक्त पंचायत बनाने के लिए सब की भागीदारी सुनिश्चित करनी होंगी | साथ ही सरकार को पंचायत को खुला पैसा देना चाहिए, जिसे पंचायत अपनी आवश्यकता के अनुसार खर्च कर सके| यानी पंचायत को शक्ति के साथ पैसे खर्च करने की स्वंत्रता भी मिलनी चाहिए| सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक स्थान पर पंचायत स्तर के योजनाओं के लिए आवंटित राशि की जानकारी पंचायत को होनी चाहिए|पंचायतों को वर्ष में कम से कम 3 ग्राम सभा करनी चाहिए| स्थानीय स्तर पर कर वसूलने और खर्च करने का शक्ति पंचायत को प्राप्त होनी चाहिए | तब जा कर हम एक सशक्त पंचायत का निर्माण कर पायेंगे|

भारत के 2.5 लाख पंचायतों में से 240 पंचायतों को नई दिल्ली में केंद्रीय पंचायती राज मंत्री श्री नरेंद्र सिहं तोमर द्वारा राष्ट्रीय पंचायत पुरूस्कार 2019 प्रदान किया गया | पुरूस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए श्री नरेंद्र सिहं तोमर ने आह्वान किया कि नए भारत का निर्माण करने के लिए हर पंचायत आगे बढ़े| ग्राम पंचायतों और सरपंचों को उन्हें प्रदान की गई शक्तियों का पूरा उपयोग करना चाहिए और सभी पंचायतों को विकास योजनाएं बनानी चाहिए ताकि सरकारी कार्यक्रमों का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जा सके|