पंचायतों को आख़िर कब मिलेगा उनका अधिकार?

पृष्ठभूमि

भारत की लगभग 65 से 70 प्रतिशत आबादी गावों में रहती है अतः इस नाते पंचायतों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है| स्वतंत्रता के पश्चात् वर्ष 1957 में योजना आयोग द्वारा विकास कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित की जाए, इसको लेकर ‘बलवंत राय मेहता समिति’ का गठन किया गया। नवंबर 1957 में समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें त्री-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था- ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर एवं ज़िला स्तर लागू करने का सुझाव दिया गया।

वर्ष 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें स्वीकार की तथा 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर ज़िले में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश की पहली त्री-स्तरीय पंचायत का उदघाटन किया गया।

पंचायती राज व्यवस्था के रूप में क्रांतिकारी बदलाव:

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में प्रभावी हुआ। संसद द्वारा पारित होने के बाद विधेयक को 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई तथा 24 अप्रैल, 1993 से 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुआ।

इसलिए 24 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में भाग-9 जोड़ा गया जिसके बाद पंचायतों को स्थानीय सरकार के दर्ज़ा हासिल हुआ।

‘पंचायती राज दिवस’ के इस मौके पर हम सभी के सामने ये सवाल है कि क्या पंचायतें वास्तव में उतनी सशक्त हो पायीं हैं जैसा की संवैधानिक संशोधन में सोचा गया था?

73वें संवैधानिक संशोधन के बाद पंचायतों का महत्व:

संवैधानिक संशोधन के बाद पंचायती राज की त्री-स्तरीय व्यवस्था के अंतगर्त ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया जिसके तहत लोग वोट देकर अपनी मर्जी से प्रतिनिधियों का चयन करते हैं| इसके पीछे मंशा यह थी कि एक ऐसी सरकार हो जहाँ जनता की पहुँच हो तथा इसके माध्यम से समाज का अंतिम व्यक्ति भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर पाए|
पंचायती राज अधिनियम के अनुसार ग्राम सभा को संवैधानिक स्तर पर मान्यता मिली है तथा इसे पंचायत व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया गया है। पंचायतों को जमीनी ज़रूरतों एवं परिस्थितियों की बेहतर जानकारी होती है अत: ऐसे में लिए गए निर्णयों की जमीनी वास्तविकता से जुड़े रहने की सम्भावना ज्यादा होती है।
प्रावधान किया गया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए सीटों का आरक्षण होगा ताकि वे भी हर तरह से सशक्त हो पाएं| इससे कहीं न कहीं आज इन लोगों को भी प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ अपने समुदाय की आवाज़ को आगे लाने का मौका मिला है|
महिलाओं को पंचायतों में एक तिहाई आरक्षण देने के बाद इसमें उनकी भागीदारी से अन्य महिलाओं को भी अपनी बात रखने की प्रेरणा मिलती है| बल्कि वर्तमान में तो अधिकाँश राज्यों ने महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण दे दिया है| इसलिए अब ये और भी जरुरी हो जाता है कि महिलाएं अपने नेतृत्व क्षमता को निरंतर बढ़ाते हुए जनता की अगुवाई करे|

वर्तमान में पंचायतों की वास्तविक स्थिति:

बेशक संविधान ने पंचायतों को सशक्त करने के लिए बहुत सारे प्रावधान किये हैं लेकिन वास्तविकता तो कुछ और ही देखने को मिलती है! एक बड़ा कारण राज्य सरकारों का पंचायतों को मज़बूत करने में राजनैतिक दृढ़ता का अभाव देखने को मिलताहै| केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने वर्ष 2015-2016 में विकेंद्रीकृत रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार, देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जिसे पंचायतों को सशक्त करने के लिये 100 अंक प्रदान किये जाएँ। रिपोर्ट के अनुसार कार्यों के हस्तांतरण के मामले में बेहतर करने वाले राज्यों में कर्नाटक, केरल तथा राजस्थान हैं| पंचायतों में अधिकारियों को हस्तांतरित करने में बेहतर करने वाले राज्यों में केरल, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश है| ग्राम पंचायत स्तर पर निधि हस्तांतरण के मामले में केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु बेहतर राज्यों में से एक हैं| राज्य सरकारों के पंचायती राज क़ानून का विश्लेषण करने के बाद मालुम चलता है कि संवैधानिक दर्जा देने के बावजूद भी राज्यों ने पंचायतों को सभी कार्य हस्तांतरित ही नहीं किये हैं| उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश पंचायती राज क़ानून के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य ने 29 विषयों में से जिला पंचायतों को 17, पंचायत समिति को 16 तथा ग्राम पंचायत को केवल 11 कार्य ही हस्तांतरित किये हैं|

अगर आप अपनी पंचायत में भी देखें तो चाहे आंगनवाड़ी केंद्र हो, स्कूल हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हो, ये सब पंचायत से अलग ही चलते हैं| पंचायत के पास वो हक़ नहीं है कि यदि वो उनके काम से असंतुष्ट हो तो इसके लिए किसी तरह का कोई एक्शन ले पाएं|

उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश के एक सरकारी विद्यालय में महिला शिक्षिका स्कूल में कभी भी समय पर नहीं आती थी, इस पर पंचायत ने विभाग से कई बार शिकायतें की| बावजूद इसके शिक्षिका पर कोई कार्यवाई ही नहीं हुई क्योंकि शिक्षकों की नियुक्ति, पदोन्नति तथा निलंबन का अधिकार केवल शिक्षा विभाग के पास है| तो ऐसे में पंचायत चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकती क्योंकि राज्य ने उन्हें वो अधिकार ही हस्तांतरित नहीं किये हैं कि वे इस तरह के मामलों पर कुछ हस्तक्षेप कर पाएं!

तो ऐसे में फिर सवाल उठता है कि संवैधानिक दर्जा मिलने के बावजूद आज भी पंचायतों की भूमिका क्या रह जाती है? यही कारण है जिसकी वजह से ज्यादातर राज्यों में पंचायतें अन्य विभागों के कार्य में रूचि नहीं लेतीं तथा सोचने वाली बात यह भी है कि जब हम-आप पंचायत चुनाव में विभिन्न क्षेत्रों के विकास कार्यों हेतु सरपंच को वोट करते हैं तो बिना किसी अधिकार शक्ति के सरपंच भी क्या कर पायेंगे क्योंकि उनके हाथ में तो वास्तव में कुछ है ही नहीं!

अतः राज्य सरकारों को ये समझना जरुरी है कि जिस तरह से संविधान में पंचायती राज व्यवस्था के लिए प्रावधान किये हैं यदि पंचायतों को वे सभी अधिकार काम, पैसा और कार्य करने के लिए अधिकारियों सहित हस्तांतरित किये जायेंगे तो निश्चित तौर पर पंचायतें अपने आपको ज्यादा बेहतर साबित कर पाएंगी| अधिकार देने के साथ-साथ राज्य द्वारा क्षमता निर्माण के लिए एक ऐसा संस्थागत सिस्टम बनाना होगा जो समय-समय जमीनी आवश्कताओं का मुल्यांकन करके स्थानीय सरकार की कार्य क्षमता को बढ़ाता रहे| इससे कहीं न कहीं राज्य को भी सहयोग मिलेगा जिससे दोनों सरकारों के बीच सलाह, भागीदारी तथा जवाबदेही का रिश्ता बन पायेगा|