चुनावी घोषणा पत्र के वायदे आखिर कब ज़मीनी हकीकत का रूप ले पायेंगे?

जैसे ही चुनावी बिगुल बजता है वैसे ही राजनीतिक पार्टियां और राजनेता, चुनावी वादों के साथ जनता के बीच अपनी उदारता का प्रदर्शन करते हैं। एक वोटर होने के नाते लोगों के दिमाग़ में भी चुनावी मौसम में बहुत सारी उथल-पुथल रहती है|

ऐसे में हमने भी “हम और हमारी सरकार” कोर्स के अपने कुछ प्रतिभागियों से चुनाव एवं उसमें किये जाने वाले वायदों के बारे में उनके विचार जानने चाहे| उन्होंने भी एक सशक्त नागरिक होने के नाते खुलकर अपनी प्रतिक्रियायें कुछ इस तरह से दी हैं:

“मैं शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 15 वर्षों से कार्य कर रहा हूँ, राजनीतिक पार्टियां भले ही बड़े-बड़े मुद्दे लेकर सामने आये लेकिन मेरा मानना है कि जब तक हमारी शिक्षा बेहतर नहीं होगी तब तक हर चीज व्यर्थ है, अभी शिक्षा पर बहुत काम करने की आवश्यकता है|”

“मुझे लगता है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी हो, सभी एक जैसी बातें करती हैं, लोग इस उम्मीद से उन्हें चुनते हैं ताकि उनको मिलने वाली सेवाएं ज्यादा बेहतर और सुगम हों, लेकिन परिणाम अभी भी इससे परे है |”

“मैं जिस गाँव में रहता है वहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले एक वर्ष से डॉक्टर की ड्यूटी सप्ताह में केवल तीन दिन होती है क्योंकि बाकी दिन उसे दूसरे केंद्र में जाना पड़ता है जिस वजह से हमें बहुत परेशानी होती है, इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करना बहुत जरुरी है |”

आईये हम अपने प्रतिभागियों द्वारा उठाये गए मुद्दों को ही लेते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य की ज़मीनी वास्तविकता को समझने की कोशिश करते हैं|

सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के बाद भारत में प्रारंभिक शिक्षा में साल दर साल बच्चों के नामांकन में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन इस बात से भी कतई मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है,कि बच्चों के शिक्षण स्तर में भी समय के साथ-साथ ख़ासी गिरावट देखी जा रही है|

नेशनल अचीवमेंट सर्वे बच्चों के शिक्षण स्तर को जानने वाला भारत सरकार का सबसे बड़ा सर्वेक्षण है।
नवंबर 2017 में, सरकार ने देश के 700 जिलों में 1.1 लाख स्कूलों के 22 लाख छात्रों को शामिल करते हुए यह सर्वे किया गया |
राष्ट्रीय स्तर पर, सर्वे के अनुसार कक्षा 5 के 64 प्रतिशत बच्चों में से केवल आधे बच्चे ही समझकर पाठ पढ़ पा रहे थे और गणित विषय में भी बच्चों की स्थिति बहुत कमज़ोर रही| वहीँ सरकार के खुद के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2017 तक, सर्व शिक्षा अभियान योजना के अंतर्गत शिक्षकों के 22 प्रतिशत पद खाली पड़े थे।

तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्यों राजनीतिक पार्टियों द्वारा इस बात पर विचार नहीं किया जाता कि एक तरफ हम भारत को युवाओं का देश कहते हैं और इस बात से अन-सुने रह जाते हैं कि इस तरह से बच्चों का भविष्य वास्तव में कैसा होगा?

दूसरी तरफ, अगर स्वास्थ्य के क्षेत्र की बात की जाए तो इसकी स्थिति भी किसी से छुपी नहीं है| भारत अस्पतालों में बेड जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है| नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के अनुसार, 2015 में किसी भी सरकारी अस्पताल में एक बेड के मुकाबले मरीजों की औसत संख्या 1,833 थी, जो वर्ष 2017 में बढ़कर 2,046 प्रति व्यक्ति हो गई|

मार्च 2017 तक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टरों के 20% और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 65% पद खाली थे| ऐसे में स्वास्थ्य सेवाएं क्या बेहतर हो पाएंगी?

नेता अक्सर जनता से पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोज़़गार का वादा करते देखे जाते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि सत्ता में आने के बाद इन वादों को हकीकत में किस तरह से बदलेंगे|

हर चुनाव में यह मुद्दे उठाये जाते हैं, इसके बावजूद भी क्यों वोटदाता आज तक इन मूलभूत सेवाओं से वंचित है?

घोषणापत्र की विश्वसनीयता और धरातल पर उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की जवाबदेही असल में किसकी है? कब तक लोग अपनी जरुरी मूलभूत सेवाएं पाने के लिए ऐसे ही संघर्ष करते रहेंगे?

यह बात सही है कि गरीबों और वंचित तबके की सहायता के लिए चलाई जा रही ढेरों योजनायें हैं लेकिन इन योजनाओं का ज़मीनी सच भी किसी से छुपा नहीं है| अतः राजनीतिक दलों को अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करने से पहले इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि अगर कोई भी सेवा ज़मीनी स्तर पर पहुँचानी है तो पहले इस बात को भी समझना बहुत ज़रूरी है कि उन सेवाओं को असल लाभार्थी तक पहुंचाने के लिए अवश्यक संसाधन और उसके अनुसार लोग भी नियुक्त करने होंगे| इसी से सेवाएं बेहतर हो पाएंगी अन्यथा यही मुद्दे हमें आने वाले कई वर्षों तक ऐसे ही सुनने और देखने को मिलेंगे|

(इस लेख में दिए गए सभी आँखड़े एकाउंटेबिलिटी इनिशिएटिव बजट ब्रीफ्स से लिए गए हैं। )