कोरोना आपदा में मजदूरों को राहत देने के लिए क्यों जरुरी है सरकार और संस्थाओं की सहभागिता?

किसी भी देश के विकास में मज़दूरों की भूमिका बेहद अहम होती है| हर वर्ष मई माह में ‘मज़दूर दिवस’ के तौर पर उनकी अहमियत के बारे में तो काफी बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं, लेकिन क्या वाकई में आज भी उनको अपना वास्तविक हक़ मिल पा रहा है?

कोरोना महामारी के चलते जैसे ही पूरे देश में लॉकडाउन हुआ उसके बाद से ही मज़दूरों का पलायन शुरू हो गया तथा विभिन्न स्रोतों के माध्यम से प्रतिदिन मज़दूरों से जुड़ी अनेकों तकलीफें सुनने को मिल रही हैं| इस स्थिति में जब सरकार अपने स्तर पर राहत देने का प्रयास कर रही है तो साथ ही विभिन्न संस्थाएं भी अपनी भूमिका को पुरज़ोर तरीके से सामने लाते हुए समाज के प्रति अपनी ख़ास उपस्थिति सुनिश्चित करवा रही हैं|

जब सरकार, संस्थाओं के कार्यों से प्रभावित होकर उनके मॉडल को अपनाती है तथा उन पर कार्य करते हुए आगे ले जाती है तो उसके परिणाम ज्यादा ठोस तथा प्रभावी देखने को मिलते हैं|

 एक उदाहरण है आजीविका ब्यूरो संस्थान, राजस्थान, जिसमें बतौर प्रोग्राम मैनेजर के पद पर काम करने वाले संतोष पुनिया जी से हमने बात की जिन्होंने बताया कि उनकी संस्था द्वारा वर्ष 2011 में मज़दूरों के अधिकारों एवं शिकायतों के निवारण हेतु एक हेल्पलाइन नंबर शुरू किया गया| इसकी शुरुआत एक लैंडलाइन नंबर से हुई| पूरे राजस्थान से लोगों की बहुत सारी शिकायतें आने के बाद इसे टोल फ्री नंबर में बदल दिया गया तथा सरकार के साथ मिलकर मज़दूरों की शिकायतों का निवारण करने का काम शुरू हुआ| संस्था की इस पहल तथा उसके प्रयासों से प्रभावित होकर 2015 में राजस्थान सरकार के लेबर डिपार्टमेंट ने इस हेल्पलाइन नंबर को अपना लिया, जिससे इसे एक संस्थागत पहचान मिली|

यह प्रयास आजीविका ब्यूरो संस्था तथा राजस्थान सरकार के साझा प्रयास से आगे बढ़ रहा है जिसे संस्था द्वारा ही लीड किया जाता है तथा जो भी कॉल इस टोल फ्री नंबर पर आते हैं उन्हें संस्था के लोगों द्वारा ही सुना जाता है| आमतौर पर इस नंबर पर मज़दूरों के 90 प्रतिशत कॉल दिहाड़ी से जुड़े मुद्दों पर आधारित होते हैं जैसे पैसा न मिलना या देर से मिलना, पैसा कटौती, पैसे देने के लिए टाल-मटौल करना, मुआवज़ा न मिलना, काम से बिना नोटिस निकाल देना आदि शामिल होता है|  

राजस्थान में जैसे ही लॉकडाउन शुरू हुआ वैसे ही टोल फ्री नंबर को ‘कोरोना रिस्पांस हेल्पलाइन’ के नाम से बदल दिया गया| पहले आमतौर पर प्रतिदिन कॉल 150 से 200 तक आती थीं लेकिन संतोष जी बताते हैं कि कोरोना महामारी के चलते शिकायतों में भारी बढ़ोत्तरी हो गयी और एक दिन में लगभग 1000 कॉल आने शुरू हो गए|

इसमें मुख्य रूप से मज़दूरों की यात्रा से संबंधित, खाने से संबंधित, पिछले महीनों का वेतन न मिलना या उसमें भारी कटौती से संबंधित तथा नौकरी से निकालने आदि शिकायतें आने लगीं| इसके अलावा सरकार ने जो मज़दूरों के लिए पैसा जारी किया उसके सम्बन्ध में जानकारी लेने तथा जिन लोगों को उसका लाभ नहीं मिला था उनकी शिकायतें भी आनी शुरू हुईं| सभी शिकायतें संस्था के कॉल सेंटर में प्राप्त की जाती हैं तथा हफ्ते वार वे शिकायतें श्रम विभाग, राजस्थान को स्थानांतरित कर दी जाती हैं| इसके बाद बाद श्रम विभाग एवं आजीविका ब्यूरो संस्था की टीम द्वारा सभी शिकायतों पर केस मैनेजमेंट सिस्टम सॉफ्टवेयर के माध्यम से फॉलो-अप किया जाता है तथा यह सुनिश्चित किया जाता है कि लोगों की शिकायतों का निवारण हो पाए|    

सरकार के साथ काम करने को लेकर संतोष जी बताते हैं कि जब सरकार को किसी संस्था का कांसेप्ट बेहतर लगता है तथा साथ जुड़कर कार्य करती है तो इससे सरकार का पूरा सिस्टम एकजुट होकर हर तरह से मदद करता है| इससे कहीं न कहीं सेवाओं को बेहतर करने के लिए संस्था तथा सरकार दोनों के जुड़ने से ज़मीनी स्तर पर ज्यादा प्रभाव दिखाई पड़ता है क्योंकि दोनों का उद्देश्य तो एक ही है|

 इस उदाहरण से समझ में आता है कि जब संस्थाएं सरकार तथा एक दूसरे के साथ जुड़कर किसी उद्देश्य पर काम करती है तो उसके परिणाम ज्यादा असरदार होते हैं | इसलिए हम सभी संस्थाओं को अब यह तय करना चाहिए की हम किस तरह से, किस स्तर पर एक दूसरे के साथ इकठ्ठे होकर सरकार के साथ जुड़ सकते हैं ताकि एक बेहतर सेवा वितरण प्रणाली का निर्माण हो पाए|