कुछ और क़दम अभी चलना है

मेरा नाम अमरदीप कुमार है और मैं अलवर जिले का रहने वाला हूँ| मेरी शिक्षा एम्.एस.डब्ल्यू व लॉ ग्रेजुएट है| मैं पिछले करीब 13 वर्षों से सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर ग्रामीण क्षेत्र में काम कर रहा हूँ| 5 वर्षों तक मैंने टोंक जिले में जिला गरीबी उन्मूलन परियोजना में आदर्श ग्राम उद्योग समिति संस्था के साथ काम किया जोकि राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित किया जा रहा था| अब मैं पिछले 8 वर्षों से इब्तिदा संस्था से जुड़ा हूँ| इब्तिदा एक अलाभकारी, गैर सरकारी विकासोन्मुख संस्था है जो एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जिसमें गरीब व पिछड़े सामाजिक समूह, आर्थिक तथा सामाजिक व राजनैतिक रूप से सशक्त होकर विकास की प्रक्रियाओं में भाग लें एवं उनकी संसाधनों तक सामान पहुँच हो| जिससे गरीबी, वंचितता व भेदभाव को कम किया जा सके|

अधिकार प्रोग्राम: अधिकार सखी द्वारा लोगों को सशक्त बनाना

पिछले 2 वर्षों से मैं इब्तिदा संस्था द्वारा संचालित ‘अधिकार कार्यक्रम’ में मदद कर रहा हूँ| यह कार्यक्रम 160 गाँव में संचालित है जिसमें मुख्य रूप से सरकार द्वारा संचालित योजनाओं को लेकर काम कर रहे हैं| इसके साथ ही पंचायती राज ढांचे को लेकर आम जन की समझ व जुड़ाव/पहुँच पर काम कर रहे हैं क्योंकि गाँव का गरीब व्यक्ति सरकार द्वारा संचालित योजना की जानकारी के अभाव में वंचित रह जाता है और फिर उसका शोषण शुरू होता है| अतः हम समुदाय को न केवल सरकार की योजनाओं की जानकारी देते हैं बल्कि पंचायती राज की त्री-स्तरीय व्यवस्था के सरकारी कार्यालयों व ज़िला कलेक्टर कार्यालय तक का शैक्षणिक भ्रमण करवाते हैं | 

हम गाँव स्तर पर एक संगठन का निर्माण करते हैं जिसे ‘ग्राम अधिकार समिति’ कहते हैं जिसमें 10 से 15 महिला सदस्य होते हैं और उनकी मदद को लेकर प्रत्येक गाँव स्तर पर महिलाएं एक ग्राम ‘अधिकार सखी’ का चयन करवाते हैं| ये सभी मिलकर गाँव स्तर पर योजनाओं के पात्र सदस्यों या वंचित सदस्यों को सरकारी योजनाओं की जानकारी प्रदान करते हैं तथा साथ ही उन्हें योजनाओं का लाभ दिलवाने का प्रयास करते हैं| इसमें सार्वजनिक मुद्दों जैसे सड़क, पानी, मनरेगा, आंगनवाड़ी व राशन वितरण आदि को लेकर भी ये साझा रूप से काम करते हैं|

महिलाओं की भागीदारी: रुढ़िवादी मानसिकता के कारण मुश्किल

हम प्रत्यक्ष रूप से पिछले 2 वर्षों से पंचायत में महिलाओं की भागीदारी को लेकर काम कर रहे हैं| इस काम में हम गाँव की महिलाओं की भूमिका, उनका हक़ और स्थानीय सरकार में आवश्यकता पर न सिर्फ प्रशिक्षण करके जानकारी प्रदान करवाते हैं बल्कि उन्हें संगठित कर संगठन के रूप में पंचायत तक पहुंचाने में मदद करते हैं चाहे पंचायत की बैठक हो या फिर ग्राम सभा की बैठक|

लेकिन समाज की रुढ़िवादी मानसिकता की वजह से महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत पंचायतों ने बहुत ही कम देखने को मिलता है| मैंने तो ये भी देखा है कि समाज अथवा पंचायत प्रतिनिधियों का भी उन्हें जोड़ने हेतु कोई प्रयास नहीं है बल्कि उनसे सवाल खड़े किये जाते है कि आपका पंचायत में क्या काम? अगर कोई काम है तो घरवालों को भेजो! 

मुझे लगता है कि पंचायती राज ढांचे में महिलाओं की भागीदारी को लेकर अभी बहुत काम करने की जरूरत है तथा उनमें आत्मविश्वास जगाने की बहुत जरूरत है| मैंने देखा और महसूस किया है कि जहाँ पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है वहां इन्होने पंचायत में वास्तविक मुद्दों को उठाया है और उन पर काम किया है| इस बात को दबे मन से पुरुष समाज ने भी स्वीकार है| जैसे मनरेगा, पानी, राशन, गैस, सड़क, शराबबंदी व आंगनवाड़ी आदि की मांग जैसे मुद्दे ज्यादातर महिलायें ही पंचायत में उठाती हैं|

चुनाव में सही मुद्दों पर फोकस ज़रूरी

इन दिनों राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव अपने चरम पर हैं| जिस तरह से पंचायती राज संस्थाओं में विकेंद्रीकरण हुआ है उसके पीछे सोच यही रही है कि गाँव स्तर पर विकास की योजना का निर्माण हो, सभी की भागीदारी हो, महिलाओं को भी बराबरी का दर्जा मिले, गाँव स्तर पर सत्ता का केंद्र हो, ग्राम सभाओं का आयोजन हो, पिछड़े वर्गों को भी स्थानीय सरकार में हिस्सेदारी मिले| सरकार द्वारा किये गए प्रावधानों से इस बात में तो निश्चित रूप से बदलाव आया है कि जनता का स्थानीय सरकार के प्रति रूझान बढ़ा है| 

लेकिन मैंने ये भी देखा है कि जैसे ही पंचायत चुनाव आते हैं, लोग काम के मुद्दों को भूलकर प्रत्याशी की जाति, धर्म, प्रलोभन आदि को केंद्र में रखकर वोट देते हैं| क्योंकि पंचायत का चुनाव बहुत स्थानीय होता है तो प्रत्याशी को भी अधिकतर वोटर का पता होता है कि वह कैसे और किन प्रलोभनों के साथ जुड़ सकता है| आज भी सरकार की सतर्कता के बावजूद पंचायत चुनाव में शराब का, पैसों का व अन्य प्रलोभन धड़ल्ले से चलते हैं| कुछ जगह महिला प्रत्याशी का सिर्फ नाम होता है भागीदारी पुरुष ही करते हैं|

अगर सही मायने में आमजन को लाभ दिलाना है तो हमें चुनावों में प्रलोभनों से ऊपर उठकर निम्नलिखित मुदद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए जैसे: गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, पेयजल एवं स्वच्छता, आजीविका संवर्धन गतिविधियाँ, सड़क, बिजली की समुचित व्यवस्था, आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों व धरोधर का संरक्षण, महिलाओं व बच्चियों को बढ़ावा, सरकार द्वारा चलाई जा रही सभी योजनाओं का पात्र व्यक्तियों को बिना भेदभाव लाभ प्रदान करवाना आदि चुनावी मुद्ददे होने चाहिए|

अतः एक जागरूक वोटर होने के नाते हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ निम्नलिखित सोच निकलकर आये:
  • चुनाव में प्रत्याशी को सेवा भाव से प्रेरित होकर आना चाहिए। 
  • मतदाताओं को प्रलोभन, जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर निष्पक्ष रूप से योग्य व सेवाभावी प्रत्याशी के पक्ष में वोट देना चाहिए। 
  • महिलाओं को अपने पद पर स्वयं को ही अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। 
  • पंचायत कार्यालय निश्चित रूप से रोजाना खुले तथा पंचायत की लोगों के प्रति जवाबदेही तय हो। 
  • पंचायत जनप्रतिनिधियों का प्रशिक्षण चार्ट बने व उसी के अनुसार उनका निरंतर प्रशिक्षण होना चाहिए जिससे कि उन्हें पंचायत को बेहतर सञ्चालन की जानकारी व अवसर मिले। 
  • ग्राम सभा व पंचायत बैठकों का वास्तविक स्वरुप हो व तय समय में आयोजन हो।  
  • पंचायत मुख्यालय व गाँवों के बीच बहुत दुरी बहुत अधिक न हो, क्योंकि दूरी की वजह से भी महिलाओं व आम जन ग्राम सभा आदि से नहीं जुड़ पाते। 
  • ग्राम विकास योजना का बेहतर निर्माण व सभी की भागीदारी से हो। 
  • वार्ड पंचों को भी उनकी भूमिका पता हो व वार्ड सभाओं का आयोजन करके प्रत्येक वार्ड से विकास के मुद्दे तय किये जाने चाहिए। 
  • जिस तरह से आज तकनीक का समय है और सब जानकारियां ऑनलाइन हैं अतः जनप्रतिनिधियों का शिक्षित होना भी जरुरी है। 

(अमरदीप कुमार राजस्थान में इब्तिदा संस्था में काम करते है । दिसंबर 2019 में उन्होंने अलवर में ‘हम और हमारी सरकार’ कोर्स में हिस्सा लिया था।यहाँ लिखे गए सारे विचार केवल लेखक के हैं और किसी भी तरह से लेखक की संस्था या अकॉउंटबिलिटी इनिशिएटिव के विचारों को व्यक्त नहीं करते हैं।)