आईये, पर्यावरण का संरक्षण करें!

जैसा की हम सभी जानते हैं कि प्रतिवर्ष जून माह में पर्यावरण दिवस पूरे विश्व में मनाया जाता है| विश्व में लगातार प्रदूषण और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग की चिंताओं के चलते, विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत की गई थी। 19 नवंबर 1986 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ था, जिसके अंतर्गत जल, वायु, भूमि- इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव, अन्य जीवित पदार्थ आदि पर्यावरण के तहत आते हैं|

पर्यावरण दिवस के आते ही सरकार के साथ-साथ आम नागरिक इस दिन पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित विभिन्न कार्यक्रमों के साथ-साथ पौधारोपण भी करते हैं| लेकिन सवाल यह है कि क्या इंसानों का प्रकृति के प्रति किसी खास दिन के लिए ही इतना संजीदा होना काफी है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वायु प्रदूषण को इस प्रकार परिभाषित किया है, ‘वायु प्रदूषण एक ऐसी स्थिति है जिसमें वातावरण में मनुष्य और पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले तत्व ज्यादा मात्रा में जमा हो जाते हैं|’ वैसे तो आज पूरी दुनिया वायु प्रदूषण का शिकार है, लेकिन भारत के लिए यह समस्या कुछ ज्यादा ही घातक होती जा रही है| डब्लूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारत के ही हैं| द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की हवा में मौजूद पीएम 2.5 कणों की वजह से कहीं बहुत अधिक तो कहीं बहुत कम बारिश हो सकती है| डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू वायु प्रदूषण से हर साल पूरे विश्व में 38 लाख लोगों की मौत हो जाती है| ये प्रदूषण खाना बनाने या लालटेन जलाने के लिए लकड़ी या केरोसीन जैसे ईंधनों के इस्तेमाल से होता है| दुनिया भर में करीब तीन सौ करोड़ से ज्यादा लोग इस तरह के ईंधनों पर निर्भर हैं|

कोरोना संक्रमण ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में लगातार निवेश की आवश्यकता पर फिर से ध्यान आकर्षित किया है। इसके अंतर्गत उन सभी कारकों को कम करना जरुरी है जिनकी वजह से बीमारियाँ ज्यादा मात्रा में बढ़ती हैं| वायु प्रदूषण, भारत में कुपोषण के पीछे दूसरा सबसे बड़ा कारण है। वायु प्रदूषण से आमतौर पर कार्डियो-श्वसन रोग, वयस्कों में फेफड़े का कैंसर और बच्चों में तीव्र श्वसन संक्रमण शामिल हैं। इसके अलावा, उभरते हुए शोध बताते हैं कि यह बचपन में बच्चों के विकास जिसमें जन्म का वजन और वृद्धि को भी प्रभावित करता है।

‘द इकॉनोमिक टाइम्स’ में छपे एक लेख के अनुसार प्रदुषण से न केवल लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है बल्कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था भी बहुत नुकसान हो रहा है| साल 2016 में आई वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि साल 2013 में वायु प्रदूषण की वजह से भारत ने जीडीपी का 8.5 फीसदी हिस्सा खो दिया| ऐसा लोक कल्याण के लिए किये जाने वाले काम पर खर्च बढ़ने और श्रम के घंटे में कमी की वजह से हुआ|

हालांकि 15 वें वित्त आयोग ने वित्त वर्ष 2020-2021 के लिए अपनी रिपोर्ट में बड़े शहरों के नगर निगमों में आसपास की वायु गुणवत्‍ता में सुधार के लिए वर्ष 2020-21 के लिए 4,400 करोड़ रुपये के अनुदान की सिफारिश की थी जिसे सरकार ने मान्यता प्रदान कर दी है। इसके लिए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन को इन शहरी स्थानीय निकायों के माध्यम से वांछित परिणामों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह इस तथ्य पर प्रकाश डालता है कि भले ही सरकार को आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देनी चाहिए, लेकिन अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट, वायु प्रदूषण की अनदेखी नहीं की जा सकती।
15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट 2020-2021 के तहत पहला मौका है जब किसी आयोग ने वायु गुणवत्‍ता (एक्‍यू) पर प्रमुखता से ध्‍यान दिया और इस वित्त आयोग ने न केवल 2020-21 के लिए अनुदान की सिफारिश की थी बल्कि इसे तय करने की अवधि के लिए रोड मैप भी प्रदान किया था। केंद्रीय वित्त मंत्री ने 2020-21 में अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करने वाले 15वें वित्त आयोग की अंतरिम सिफारिशों को स्वीकार कर लिया, जिससे अब इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि इस सन्दर्भ में कुछ ठोस बदलाव देखने को मिलें।

कोरोना संक्रमण के दौर में जिस तरह प्रकृति ने इंसानों की अनुपस्थिति में अपने संसाधनों जैसे जल एवं वायु को स्वच्छ किया है, उससे हमें ये निश्चित तौर पर मानना होगा कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने में हम इंसानों ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी है| न केवल सरकार के लिए बल्कि एक नागरिक के तौर पर अब हमें भी लगातार यह सोचना बेहद ज़रूरी है कि हम किस तरह से अपने स्तर पर पर्यावरण को बचा सकते हैं| वर्तमान चुनातियों को ध्यान में रखते हुए हम सभी को यह समझना होगा कि जब पर्यावरण स्वच्छ रहेगा तभी इस धरती पर जीवन संभव हो पायेगा| इसलिए प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम करें, अधिक से अधिक पौधे लगाएं, वायु प्रदुषण को रोकने के लिए वे सभी कारगर कदम उठाएं जिससे यह कम हो पाए क्योंकि यदि ‘आज संभल पायेंगे, तभी कल साँस ले पायेंगे’|